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  1. नवगीतों के उत्स में निराला भोलानाथ

भोलानाथ निराला का आभिर्भाव भारतीय साहित्य-संसार का बसंतोत्सव है !अपने अनुभव और सामर्थ्य से जो भी और जैसा भी जितना भी साहित्य को टटोल और खंगाल पाया हूँ !नवगीत के फूटते हुए उत्स देख और समझ पाया हूँ !निराला जिनमे नवगीत का प्रथम उत्स फूटता हुआ दिखाई देता है संक्षिप्त परिचय नवगीत की गंगोत्री का आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ इस आशा और विस्वास के साथ की सुनी सुनाई भ्रांतियां के बहार निकल कर हम नवगीत की शक्ति और सामर्थ्य को समझ सकें ! विस्मार्क की लौह और रक्त की कूटनीति सेविषाक्त हुए विश्व में उन्नीसवीं शताब्दी जब दम तोड़ रही थी ,निराला का जन्म शताब्दी के अंतिम बसंत में २१फ़रवरी १८९९ के दिन बंगाल के मिदनापुर जिले की महिषादल रियासत में हुआ !निराला गढ़ाकोला का दैन्य और करुना ,महिषादल की सघन हरीत्मा ,बैस्वाडे का ठेठ पौरुष,वैदिक परम्परा पांडित्य लेकर अवतरित हुए ! वे आजीवन शोषण दुरव्यवस्था के अंधमहासगर मथते रहे, विष पीते रहे और अमृत बांटे रहे !निराला के जितने रंग हैं,उनके न रहने पर साहित्यिक बनियों ने उन रंगों से व्यापारिक मेले सजाये और अपने घर भरे,पर निराला के मन में बसे दीन- हीन मनुष्य के भाल का मंगल अभिषेक न हुआ !पुरुषोत्तम दास टंडन और रामचंद्र शुक्ल की उपस्थिति में साहित्य सम्मलेन में पीटने वाला निराला ,जिस भारतीय और भारतीय मनुष्य के गौरव के लिए लड़ता रहा, आज भी वह उतना ही बंधुआ है,उतना ही गिरवी,और उतना ही पराधीन है ! निराला के सामने जितने भी रस्ते थे,वे सब इतने संकीर्ण थे की उनके महाप्राण न तो उन्हें स्वीकार कर सकते थे,न तो उनमें उनका विराट व्यक्तित्व समा सकता था ! तो निराला के कवी को जीवन भर चट्टाने कटनी पड़ीं और पीठ पर नदी ढोनी पड़ी ! बस इसी संघर्ष और श्रजन के बीच अमृत का जो ज्योतिर्मय निर्झर,हजारों सालों से कुचले गए सामान्यजन के चुल्लू तक पहुँच पता है !उसे ही हम नवगीत की संज्ञा देकर निराला और निराला के बाद की छान्दसिक कविता को पंडों और प्रदुषण से मुक्त रखने की च्येष्ठ में जुटे हुए हैं ! निराला के श्रजन में उनके संघर्ष और उनके संघर्ष में इस सृजन को देखे बिना,न तो नवगीत के प्रथम उत्स के रहस्य को समझा जा सकता है और न ही निराला के व्यक्तित्व और कृतित्व की व्याख्या की जा सकती है !पारम्परिक काव्य और कविता की राजनीती से कविता की विशुद्ध धरा को फोड़ कर निकलने में जहाँ चट्टानें कटीं वहीँ नवगीत का जनम हुआ और जहाँ छेनियाँ टूटीं वहां कविता छंधीन होकर रह गई ! बाद में इसी छंधीन कविता को कविता के बनियों ने नई कविता की संज्ञा देकर बेंचना – भांजना शुरू कर दिया ! फिर तो बाकायदा इसका उत्पादन भी प्रारंभ हो गया !सस्ती चीजें जल्दी बनती हैं और जल्दी बिकती हैं !लोकप्रियता अर्जित करने के के सूत्र खोज निकाले गएऔर इस तरह नई कविता और पारंपरिक सस्ते गीतों के नियोग से अक अलग ही प्रकार की कविता का जन्म हुआ !जिसे आजकल मंच की कविता के नाम से ख़रीदा और बेचा जाता है!कौन कला,परिश्रम और समय के संकट में पड़े !लोग तो आनन् फानन रहीस बनाना चाहते हैं! कविता के रहीसों में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है ! निराला के सामने दोहरी कठिनाइयाँ थीं ! अक तो उन्हें निरंतर प्रयोग से गुजरना था दोसरे तमाम तरह के घटिया लोगों के सामने अपनी प्रमाणिकता को बनाये रखना था !यही करण है की प्रयोग के तहत उनहोंने कभी छंद को छोड़ा और कभी छंदों के अभिनव प्रयोग किये !उन्हें निरंतर इन दोनों ही प्रकार की कविताओं की प्रमाणिकता के जिस तत्कालीन मठाधीशों से जूझना पड़ा !महावीर प्रसाद दूवेदी ने गढ़ाकोला से दौलतपुर तक निराला के ढोये आम तो खा लिए उनकी कविताएँ छपने से परहेज ही करते रहे !रामचंद्र शुक्ल से तो उनकी बराबर ठनी रही !रामचंद्र शुक्ल पर निरालाजी की लिखी हुई कविता का यह अंश,उनकी विनोद प्रियता, विरोधिओं को आड़े हांथों लेने को सदा तत्पर रहना तथा कलात्मक अभिव्यक्ति को प्रतिकूल समय में भी बनाये रखने की अदभुतक्षमता का परिचायक है ! - जब से एफ.ए.फेल हुआ, - हमारा कालेज का बचुआ ! - हिंदी का लिक्खाड़ बड़ा वह . - जब देखो तब ऐडा पड़ा वह, - छायावाद रहस्यवाद के - भावों का बटुआ ! आरोप की भाषा में अक बात कही जाती है की, लोग अपनी विधा को निराला से जोड़कर महान बन्ने में जुटे हुए हैं ! यह दंभी मनुष्यों की अधकचरी मानसिकता प्रलाप है ! ऐसे लोग न तो निराला को और न ही परवर्ती नवगीतकारों को समझना चाहते !ये लोग तो साहित्य की दलाली करने में सर्वस्य देखते हैं !आज की वामपंथी एवम् दक्षिण पंथी साहित्यिक संस्थाएं ऐसे ही दलालों की गिरोह बनकर रह गेन हैं !ये संस्थाएं पुरोधा कवियों का यश उड़कर बड़ी बनी हैं ! जबकि आज का नवगीतकार भारतीय कविता को आधुनिक संस्कार देने में साधना रत है ! किसी तरह के वाद से मुक्त,राजनैतिक प्रपंच से दूर रहकर छान्दसिक अभिव्यक्ति को नए क्षितिज देने में वह इतना मुग्ध एवम्मस्त है की प्रतिस्पर्धा की घटिया दौड़ में सम्मलित होने का न तो उसके पास समय है और न ही मानसिकता ! स्वयं निराला वादों के संक्रामक रोगों से कितने मुक्त थे,उनकी मास्को डायलाग्स शीर्षक कविता से यह बात समझी जा सकती है ! फिर कहा, मेरे समाज में बड़े बड़े आदमी हैं, एक से एक मुर्ख,उनको फ़साना है ! XXX XXX XXX XXX XXX उपन्यास लिखा है,जरा देख दीजिये अगर कहीं छप जाय तो प्रभाव पद जाय उल्लू के पट्ठों पर ! XXX XXX XXX XXX देखा उपन्यास मैंने श्री गणेश में मिला पृय अस्नेह्मयी स्यामा मुझे प्रेम है , इसको फिर रख दिया, देखा, मास्को डायेलाग्स देखा गिडवानी को ! निराला का जो अनुभव संसार था उसे चित्रित करने के लिए,उनके पास समय भी तो न था !उसे किसी भी तरह व्यक्त कर देने की गरज से निराला को कभी छंदों से नीचे भी उतरना पड़ा ! यह निराला के लिए निहायत जरुरी था ! किन्तु अपनी रचनात्मक समाधि के क्षणों में उन्होंने जो भी रचा,वे भारतीय कविता के अद्धितीयनमूने हैं !छंद निबद्ध ऐसी ही कविताओं को हम हिंदी के सबसे पहले नवगीत कहते हैं ! बानगी …… नव गति,नव लय,ताल छंद नव नव नभ के नव विहगवृन्द को नव पर नव स्वर दे ! वीणा वादिनी वर दे ! ये पंक्तियाँ नव्यता के प्रति निराला की उत्कट ललक को व्यक्त करती हैं !वीणा वादिनी माँ सरस्वती की वंदना में लिखी गई यह कविता, न केवल निराला के उत्कृष्ट नवगीत, नवगीतकार होने का प्रमाण प्रस्तुत करती है बल्कि इससे यह भी सिद्ध होता है की वे निरंतर नव्यता के अन्वेषण में लगे रहे ! कवी की यह अन्वेषण शक्ति ही उसकी मौलिकता और वैक्तिक पहचान को विस्तार देती है !छान्दसिक अभिव्यक्ति के लिए ही नहीं नवगीत की मूलभूतविशेषताओं और प्रवृतियों और भविष्य के प्रति निराला कितने सचेष्ट थे,बीज रूप में इन साड़ी चीजों को इस गीत में उन्होंने संचित कर दिया है !उनका “स्व” सदैव का प्रतिनिधि रहा है ! कविता से सबका मंगल हो यह कामना करते हुए कविता नव्यता – भव्यता से समृद्ध हो सभ्यता की अनमोल धरोहर बने,निराला की यह संवेदना-सदभावना ही संभावनाओं के नए द्वार नए आकाश खोलने के लिए उन्हें प्रेरित करती रही ! नव गति,नव लय,ताल छंद नव नव नभ के नव विहगवृन्द को नव पर नव स्वर दे ! वीणा वादिनी वर दे ! की प्रार्थना और कामना करने वाला कवी जब अतुकांत और छंद हीन कवितायें लिखता है ! तब यह और भी महत्त्व पूर्ण हो जाता है की कसौतिओं की जांच परख कर ली जाय, फिर सुवर्ण पर हाथ रखा जाय !निराला के मुक्त अथवा रबर या केचुआ छंद एक और साहित्यिक मठाधीशों की आलोचना का शिकार होते रहे और दूसरी और कला और कविता से बाहर की दुनियाँ के लिक्खाडों के कविता लिखने का मार्ग प्रशस्त करते रहे ! और छंद मुक्त कविताओं से किताबें, पात्र पत्रिकाएं ही नहीं कविता के मंच तक भर गए ! किन्तु निराला की छंद मुक्त कविताओं में नवगीत की वे प्रवृतियां जो निराला के समकालीन गीतों और निराला के बाद के नवगीतकारों के के गीतों में विकसित हुईं प्रचुर मात्र में देखि जा सकती हैं !काव्यात्मक अभिव्यक्ति की अनिवार्य शर्त है गति,लय,एवम् ताल, यह निराला की मुक्त छंद कविताओं में भी नए रंग और प्रभाव के साथ मुखरित हुई हैं ! निराला के मुक्त छंद इन शर्तों को नागरिक गेयता के वंचन-वनवास सहकर भी पूरा करते हैं !”जूही की कलि””संध्या सुंदरी”अथवा “जागो फिर एक बार”जैसी कवितायें बिम्ब योजना,चित्रात्मकता, लय और कथ्य की बंकिम नवीनता के अनुपम उदहारण प्रस्तुत करती है ! विजन वल्लरी पर सोती थी सुहाग-भरी-स्नेह-स्वप्न-मग्न अमल-कोमल-तनु तरुणी-जूही की कलि दृग बंद किये शिथिल पत्रांक में !

             (जूही की कली) 

“मेघमय आसमान से उतर रही है वह संध्या-सुंदरी पारी सी धीरे-धीरे-धीरे !

     (संध्या सुंदरी) 

“जागो फिर एक बार” उनकी अतुकांत और छंद मुक्त कविता है,किन्तु इसका निम्न अंश देख कर कौन कह सकता है कि,यह कविता छंद हीन होगी सवा सवा लाख पर

  एक को चढाऊंगा,

गोविन्द सिंह निज

 नाम जब कहाऊंगा,

शेरों की मांड में

 आया है फिर स्यार,

जागो फिर एक बार ! यांत्रिकता के इस दौर में व्यवस्था की विसंगतियों के प्रति छोभ और आक्रोश के बीज निराला की कविताओं में नए तेवर के साथ प्रस्फुटित होते हैं आज के प्रायः सभी समर्थ नवगीतकारों के नवगीतों में यह छोभ और आक्रोश पूरी समर्थता के साथ व्यक्त होता है ! निराला कुछ इस तरह उगलते हैं यह आग --- वहीँ गंदे में उगा देता हुआंबुत्ता पहाड़ी से उठा सर ऐंठ कर बोला कुकुरमुत्ता !

    निराला अपने युग के सबसे विलक्षण कवी थे ! कविता को लेकर जितने प्रयोग उन्होंने किये उनके मुकाबले हिंदी ही नहीं भारतीय संस्कृत साहित्य में भी कोई कवी नहीं टिकता !अन्वेषण और प्रयोग के समय लिखी गई कविताओं में जितने मूल्य,अर्थ और बोध वे दे जाते हैं वह दुर्लभ है !वे सत्य के साधक थे !उन्हें परम्पराओं को तोड़ने और नए प्रतीक निर्मित करने में बड़ा सुख मिलता था !

कुकुरमुत्ता,खजोहरा,भावों का बटुआ,अनामिका,परमिल,जूही की कलि,चमेली,जैसी कविताओं तथा चतुरी चमार,देवी,कुल्लीभाट एवं बिल्लेसुर बकरिहा जैसी कहानियों ने नए नए प्रतीकों को जन्म ही नहीं दिया बल्कि संघर्ष के बीच जन्मने वाली कविता के सामने नए प्रतीकों और पात्रों के सृजन के नवद्वार भी खोले प्रतीकात्मकता लघु कलेवर नवगीतों के आवश्यक तत्व ही नहीं प्रमाणित हुए,आज नवगीत प्रतीकों के न्वान्वेशण के आधार भी बने हैं !

   ध्वनियों के आवर्त, बिम्ब योजना,शब्द लाघव,प्रतीकात्मकता,चित्रात्मकता.एवं,लय संयोजन की आधुनिक प्रवृतियां नवगीत को निराला से ही प्राप्त हुईं !यथार्थ के धरातल पर खुरदरे शब्दों का कलात्मक प्रयोग निराला के पहले नहीं देखा गया !प्रयोगवादी दृष्टि से निराला सबसे अनूठे और अकेले कवी थे !यह अकेलापन उन्होंने सदैव महसूस किया ! नवगीत की तमाम शर्तों को पूरा करने वाला यह गीत उस युग में उनकी एकान्तिक अनुभूति को व्यक्त करता है !

मैं अकेला, देखता हूँ,आ रही

मेरे दिवस की सांध्य बेला !

पके आधे बाल मेरे, हुए निष्प्रभ गाल मेरे, चाल मेरी मंद होती जा रही

         हट रहा मेला !

जानता हूँ, नदी झरने, जो मुझे थे पार करने, कर चूका हूँ,हंस रहा यह देख

           कोई नहीं मेला !

निराला जीते जी, नव गति नवलय,-छंद नव तथा नव नभ,नव विहंग,तथा नव पर और नव स्वर से युक्त गीतों के मेले देखने को ललकते तरसते अवश्य रहे !पर आज हिंदी का साहित्य नवगीतों और नवगीत –करों के इस भव्य मेले पर गौरव कर सकता है ,जिसे जिसे नवगीतकारों की चार-चार पीढियां सजाने में व्यस्त हैं !

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हिंदी साहित्य के केंद्र में

भोलानाथ के नवगीत

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत

लगे नहीं झपकी

लौ दिया दिया भभकी

पतझर में जैसे फागुन की आग !

वल्गाएँ ढीली

घोड़ों ने पी ली

मरुस्थल में फिर से बासंती राग !

अस्ताचल ढलानों का

बेलगाम सूरज

फिर चाहे

संध्या के जूडे में

बांधना  फुलहरी,

सिन्दूरी घाटियों की

अविरल गोधूली

दिखे नहीं

काबिज सन्नाटे में

सांस की गिलहरी,

एकाकी वनखंडी

परचित पगडण्डी

दुहराये अनुभव की रंग भरी फाग !

लगे नहीं झपकी

लौ दिया दिया भभकी

पतझर में जैसे फागुन की आग !

वल्गाएँ ढीली

घोड़ों ने पी ली

मरुस्थल में फिर से बासंती राग !

श्रोत चुका पोखर

झुठलाये कैसे

मलबे में दबे दबे

सुकसा सा सूख गईं

भीतरी मछलियाँ,

पपराई माटी पर

घोंघियों के ढेर लगे

बालू से आचमन को

मचल रहीं

कापती अन्जलियाँ,

अलखाये चुप्पियाँ

रंग घोल कुप्पियाँ

चुचुआई शीश पर पारण  के भाग  !

लगे नहीं झपकी

लौ दिया दिया भभकी

पतझर में जैसे फागुन की आग !

वल्गाएँ ढीली

घोड़ों ने पी ली

मरुस्थल में फिर से बासंती राग !

उजड़ी कस्तूरी की काया

फिर मायामृग की

कल्पित स्निग्धा

वर्णित सुडौल पर

मशाल सा जली,

रंग भेद आयु आक्षेप गौंड

आन मान

पीहर चौबारों की

शकुन छाँव 

साक्ष्य की धुली,

गंध की पुकारी

गुडहल की डारी

छिड़क रही ठूंठ पर फूल का पराग !

लगे नहीं झपकी

लौ दिया दिया भभकी

पतझर में जैसे फागुन की आग !

वल्गाएँ ढीली

घोड़ों ने पी ली

मरुस्थल में फिर से बासंती राग !

भोलानाथ 

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

आँख फाड़ के

देख न औघड़

ये सबले हैं जरासंध के धड !

पुनराभ्यास में

जुटे हुये हैं

दृष्टान्तों सा

जरा के पाले,

बुद्धि के लंगड़े

तर्क असंगति

हलाकान हैं

बाहों भरे उजाले,

रक्तवंस की

नातेदारी जड

बढ़ी दरारों ढीली हुई पकड़ !

आँख फाड़ के

देख न औघड़

ये सबले हैं जरासंध के धड !

संदेशों के

खेत चरे गदहों ने

खाया पिया

पेट की भूख मिटाई,

लोटा लाटा

खदर बदर सन्नाटा

ठकुर सोहाती

मुह की लौट सुनाई,

मरे पुन्य सब

अर्थभूमि में लड़

स्वयंसिद्धि के पल्टू रहे अकड !

आँख फाड़ के

देख न औघड़

ये सबले हैं जरासंध के धड !

वही पुरानी

पृष्ठभूमि की थाली

बजी आज

फिर ठसक में अपने,

नृत्य नाटिका

कठपुतली की

मंचन में

हर ऊँगली देखे सपने,

भौंचक आँख

हमारी नुक्कड़

फाग अमीरी निहारें फक्कड़

आँख फाड़ के

देख न औघड़

ये सबले हैं जरासंध के धड !

भोलानाथ

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

शरहद सीमाओं के

जागते पहरियों की

सुने नही उम्मीदें

घुन खाई अंधी राज शाही !

जली भुनी गरम नरम

जो भी मिली पेट धाँध

नींद बाँध

चौकस खड़े हैं जमीं बर्फ माहीं !

प्राणों पर आई तो साझा किया है

दुःख अपना

अर्जियों के दंडभोग

थोपे आरोपों पर फूटती रुलाई,

रोजमर्रा में सामिल हैं धमकियाँ

सहज देखे

विस्वास नहीं होता

विपरीत निष्ठा के साजिस चतुराई,

हंस नहीं बगुलों सी

जांच की कमेटी

पूंछ परख नवटंकी

देगी हल अपनी मनचाही !

शरहद सीमाओं के

जागते पहरियों की

सुने नही उम्मीदें

घुन खाई अंधी राज शाही !

जली भुनी गरम नरम

जो भी मिली पेट धाँध

नींद बाँध

चौकस खड़े हैं जमीं बर्फ माहीं !

शरहद सीमाओं के

जागते पहरियों की

सुने नही उम्मीदें

घुन खाई अंधी राज शाही !

जली भुनी गरम नरम

जो भी मिली पेट धाँध

नींद बाँध

चौकस खड़े हैं जमीं बर्फ माहीं !

बगावत नहीं यह

विरासत में पाई गठरी की  

ठाहर पैबंद की गुजारिश

करो ख़ारिज न बाबू सरकारी,

पचड़ों के व्यूहों में बुद्धि भाव

जज्बों की अनचीन्ही

कैफियत से खेल गये

मठाधीश अपनी पारी,

गोड की गुलामी के

पुस्तैनी ढर्रे

हरगिज मंजूर नहीं हमको

हम हैं कठिन पंथ राही !

शरहद सीमाओं के

जागते पहरियों की

सुने नही उम्मीदें

घुन खाई अंधी राज शाही !

जली भुनी गरम नरम

जो भी मिली पेट धाँध

नींद बाँध

चौकस खड़े हैं जमीं बर्फ माहीं !

शरहद सीमाओं के

जागते पहरियों की

सुने नही उम्मीदें

घुन खाई अंधी राज शाही !

जली भुनी गरम नरम

जो भी मिली पेट धाँध

नींद बाँध

चौकस खड़े हैं जमीं बर्फ माहीं !

हो हल्ला किचिर पिचिर

मीडिया के आगे   

हिलक हिलक बिलखे

बूढ़े अम्मा बाबू

कसालों की खुलती जुबान पर,

लीप गया पोत गया

मार गया पालिश फिर जांच दल

कराहती रही आँख रह रह

बूचडों के झूठे वयान पर,

अभी वैसे ही चिपकी जमात से

दागदार ओहदेदारी

भरोसा सुलतान का

संसय में अभी वाहवाही !

शरहद सीमाओं के

जागते पहरियों की

सुने नही उम्मीदें

घुन खाई अंधी राज शाही !

जली भुनी गरम नरम

जो भी मिली पेट धाँध

नींद बाँध

चौकस खड़े हैं जमीं बर्फ माहीं !

भोलानाथ   

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती अपने ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा साहित्येतर मनीषी समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने के लिये तत्पर हैं !

सब स्वर लुटे

शिवालय सूना

गुमसुम विधुर दिये !

मर्माहत मन

गिने आलियाँ

अपने ओंठ सिये !

ढलता सूरज

आग का गोला

दूर क्षितिज के

पार गया,

नंगा नाच

हवाओं का

फसलें खड़ी

उजार गया ,

अगम अछूती

आँख व्यथायें

नागिन निठुर हिये !

काई फरती

मेहराबों पर

ठहरा

सहन अँधेरा,

सेंध लगाकर

देवालय में

तस्कर हुआ

चितेरा,

भाव बोध सब

अटल में डूबे

जगमग निपुर ठिये !

पूजा परछन

घींच कटी है

पीपर बरगद

छाती,

भजन आरती

वाले गुम्मद

घेरे हैं

कुलघाती,

धर्म अधर्म के

महासमर में

कैसे विदुर जिये !

.....

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती अपने ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा साहित्येतर मनीषी समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने के लिये तत्पर हैं !

जीवन है झूठा

ओंठों का

मौन नहीं टूटा

भेद क्या

खोलेंगी आँखें

गिरगिट महाजन

खाता बही का पेज कौन खोले ! 

भखराई बिस्कुट

काँड़ी कना

और किनकी का चिरकुट

उधारी की बाढ़ी

बरखा बढ़ाई

फागुन के

आँगन में काला रंग घोले ! 

मूल असल

पुरखों की

खपरैली झोपड़ी

सूदों में

गिरवी हैं पीढियाँ,

भेड़िया

दशानों में

गाँव घिरा

पगड़ी बिरासत की

टूटी हैं रीढ़ियाँ ,

मुखिया का मुख है

रैयत को

कानों का दुःख है

केवल सुना है

खाया नहीं

बेम्यादी अंतहीन कर्जा

खेत खुरपियों सा छोले !

जीवन है झूठा

ओंठों का

मौन नहीं टूटा

भेद क्या

खोलेंगी आँखें

गिरगिट महाजन

खाता बही का पेज कौन खोले ! 

भखराई बिस्कुट

काँड़ी कना

और किनकी का चिरकुट

उधारी की बाढ़ी

बरखा बढ़ाई

फागुन के

आँगन में काला रंग घोले ! 

सरकारी करिंदे

कुत्तों के जैसे

मुखिया के

पांव में

पूंछें हिलाते,

चौपाली

चर्चों में

मुँह चुपड़ी ओंठों की

गुरतरी लेप

मिलकर चढाते,

अन्यायी राजा

आता है घर पर

लठैती तकाजा

बेबस है हूँकी

निहारे लचारी

गांधी के

बन्दर हैं कौन न्याय बोले !

जीवन है झूठा

ओंठों का

मौन नहीं टूटा

भेद क्या

खोलेंगी आँखें

गिरगिट महाजन

खाता बही का पेज कौन खोले ! 

भखराई बिस्कुट

काँड़ी कना

और किनकी का चिरकुट

उधारी की बाढ़ी

बरखा बढ़ाई

फागुन के

आँगन में काला रंग घोले ! 

ज्वालामुखी की

हलचल है भीतर

कहाँ फूटेगा

आगी की

नदिया बहेगी,

हिटलर हवेली

मनमौजी

बाँट बंदर

हठ योगियों की पीड़ा

कब तक सहेगी,

सांड को सोंहारी

हाँथ से

खिलाते हैं

ठग दरवारी

ऐंठ ऐंठ मूंछें

बेधर्मी

आँख देखें न पीठ के फफोले !

जीवन है झूठा

ओंठों का

मौन नहीं टूटा

भेद क्या

खोलेंगी आँखें

गिरगिट महाजन

खाता बही का पेज कौन खोले ! 

भखराई बिस्कुट

काँड़ी कना

और किनकी का चिरकुट

उधारी की बाढ़ी

बरखा बढ़ाई

फागुन के

आँगन में काला रंग घोले ! 

भोलानाथ

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

लील लील

स्वाद भरी

झूठ की गिलौरियाँ

पचने दे रोटियों

सी पेट में

उगल उगल

नीम की निमौरियाँ

उगल आने दे

बाहर कड़वी सच्चाई !

खोद नहीं

पुरखों की

सड़ी गली लाशें

बाँध नहीं

खूंटे से घोड़े

आने दे

आँगन में धूप को

देख नहीं

तेल में अपनी परछाई !

नदियाँ

ना पूंछेंगी

पर्वत

ना पूंछेंगे

और नहीं पूंछेंगे

पोखर तलैया,

लोरेगी

डबरों में

फूंकेगी छांछ को

नाक नथुनों की

जली भुनी

दूध की बिलैया,

मरुस्थल में

चौकड़ियाँ भरते

सूरवीर ऊँटों की

आँख से

झरेगी हताशा

देख कर

पहाड़ों की

खड़ी खड़ी

चोटियों की नभछूती उंचाई !

लील लील

स्वाद भरी

झूठ की गिलौरियाँ

पचने दे रोटियों सी

पेट में

उगल उगल

नीम की निमौरियाँ

उगल आने दे

बाहर कड़वी सच्चाई !

खोद नहीं

पुरखों की

सड़ी गली लाशें

बाँध नहीं

खूंटे से घोड़े

आने दे

आँगन में धूप को

देख नहीं

तेल में अपनी परछाई !

उलझ नहीं

नातों के

जालों में

झूल नहीं ठाठों में

बन करके

मकड़ी का मुखड़ा,

मतलब परस्ती

की रिश्तेदारी

भेदेगी छाती

एडी में

जैसे चुभता

शीशे का टुकड़ा,

दोगली

दिशाओं की

कजरारी आँखों का

रहमहीन

सूखा संवेदन

छान छान कर

झँझरिया से

फेंकेगा जैसे

करहैया की माछी सिराई !

लील लील

स्वाद भरी

झूठ की गिलौरियाँ

पचने दे रोटियों

सी पेट में

उगल उगल

नीम की निमौरियाँ

उगल आने दे

बाहर कड़वी सच्चाई !

खोद नहीं

पुरखों की

सड़ी गली लाशें

बाँध नहीं

खूंटे से घोड़े

आने दे

आँगन में धूप को

देख नहीं

तेल में अपनी परछाई !

अखबारी

पन्नों में

देखो रोज रोज

छपती हैं

माटी के

शेर की ऊँची दहाड़ें,

सेहरे में सेही

बाराती चूहे

उछल उछल

सजे धजे

लग्न मंडप की

रौनक उजाड़ें,

सिर की शिखा

लहराते हवाओं में

माथे में

खड़िया का

लेप किये

शेख चिल्ली

बने हैं पुरोहित

भांवर में नागिन

बाँट रही मौतें बिदाई !

लील लील

स्वाद भरी

झूठ की गिलौरियाँ

पचने दे रोटियों

सी पेट में

उगल उगल

नीम की निमौरियाँ

उगल आने दे

बाहर कड़वी सच्चाई !

खोद नहीं

पुरखों की

सड़ी गली लाशें

बाँध नहीं

खूंटे से घोड़े

आने दे

आँगन में धूप को

देख नहीं

तेल में अपनी परछाई !

भोलानाथ

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

रुक जा रे सूरज

रथारूढ़ तू

भरी दुपहरी

उछाल न आगी सिर के ऊपर !

सूखी नदियाँ

धूप नहायी

बुझी नहीं है

आग पेट की छाँव है दूभर !

अब और तुम्हारी

नीम गुरच की

मनमानी

मंजूर नहीं हमको

बने रहो तुम

क्षितिज के लोक नियंता,

उड़ती चीलें

जीवित गाय की

आँख निकालें

निर्भय होकर

सरग में नाचें

फूटी आँख जयंता,

त्राहि त्राहि

अब नहीं करेंगी

सूखी नदियाँ कोई

तेरे सम्मुख आकर !

रुक जा रे सूरज

रथारूढ़ तू

भरी दुपहरी

उछाल न आगी सिर के ऊपर !

सूखी नदियाँ

धूप नहायी

बुझी नहीं है

आग पेट की छाँव है दूभर !

अस्ताचल का

मोड़ नहीं है दूर तुम्हारे

बस पास बहुत है

अपनी मंजिल

सायद

तुमको बिसरी याद नहीं,

तेरे पीछे

अमृत घट लेकर

खड़ी है चंदा

झिलमिल तारों

साथ रहेगी

बरसायेगी सारी रात यहीं,

सात सवारी घोड़ों

का रथ छूटेगा अब

और लगामें

ढलानों पर !

रुक जा रे सूरज

रथारूढ़ तू

भरी दुपहरी

उछाल न आगी सिर के ऊपर !

सूखी नदियाँ

धूप नहायी

बुझी नहीं है

आग पेट की छाँव है दूभर !

पगडी बंधा ताज

तख़्त की

गरिमा के

अनुकूल नहीं हैं

धूमिल धूमिल लगती हैं

रत्नों की लडियाँ,

लेप शहद

ओंठों में

माथे की रोरी

भीतर ही भीतर

परियों की टोली

गिनती हैं हथकड़ियाँ,

प्रज्ञाओं की

आँख की ख्वाहिश

अरझी हैं

पलकों के दर द्वार पर !

रुक जा रे सूरज

रथारूढ़ तू

भरी दुपहरी

उछाल न आगी सिर के ऊपर !

सूखी नदियाँ

धूप नहायी

बुझी नहीं है

आग पेट की छाँव है दूभर !

भोलानाथ

डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में

अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर

जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत

संपर्क – 8989139763

साहित्यिक मित्रों और देश वाशिओं को शुभ संध्या कह कर सभी का अभिवादन करता हूँ

मेरे अपने सभी नवोदित, वरिष्ठ,और मेरे समय साथ के सभी  गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत यथार्थ महिला दिवस के अवसर   धरातल पर साहित्यिक  संध्या की सुन्दरतम संधि काल की मोर्पंखिया  बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकर्ण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है

मुह की मिशरी 

कान में उतरी

महिला गाथा सुन

रंग में डूबीं घाटी घाटी

ह्रदय हिरन चौंकड़ियाँ ! 

फागुन वाली

ओंठ की लाली

महक पलाशी वन

वक्ष में पूजें नारी जैसे

तुलसी डाल डगलियाँ !

शक्ति श्रोत की

इस धरती से

उजड़े कैसे

मधुरस सींचे

बाग़ बगीचे, 

गौरी अंबे

रमा राधिका

ब्रम्हाणी के

क्षितिज से

कैसे सरकी नीचे, 

अमृतधारी मेह

बरसी सुधा सनेह

युग युग किये जतन

भूखे प्यासे नंगे तन को

देती रही झगलियाँ !

मुह की मिशरी 

कान में उतरी

महिला गाथा सुन

रंग में डूबीं घाटी घाटी

ह्रदय हिरन चौंकड़ियाँ ! 

फागुन वाली

ओंठ की लाली

महक पलाशी वन

वक्ष में पूजें नारी जैसे

तुलसी डाल डगलियाँ !

दुनियां भर

पीडाएं पीकर

दाँतों पत्थरियाँ

नए नए

इतिहास लिखे,

दुर्गावती अवंती

लक्ष्मी बाई 

और कभी

वह बीरा नैनी

घाव दिखे,

कभी आग अंगारा

और कभी जलधारा

बहती रही वतन

कल कल करती जैसे

सहजन में गलगलियाँ !

समय

बहेलिया

हुआ कसाईं

लावा तीतुर

जैसा पंख पखेरू नोंचे,

गोबर गौरी

हुई भंडरिया

टनटे

किलल्त से

छुटकारे की अब सोंचे,

गुलामी घट रीते

दुःख के दिन बीते

ख़ुशी आई है अगन

दुर्दिन अब तो

झाँकेंगे दूर से बगलियाँ !

मुह की मिशरी 

कान में उतरी

महिला गाथा सुन

रंग में डूबीं घाटी घाटी

ह्रदय हिरन चौंकड़ियाँ ! 

फागुन वाली

ओंठ की लाली

महक पलाशी वन

वक्ष में पूजें नारी जैसे

तुलसी डाल डगलियाँ !    

भोलानाथ

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....

पेट और जनेंद्रियों के

इर्द गिर्द घूमते

वर्तुली सवालों के

चिरजीवी

प्रश्न पत्र पढ़ते

समय सार बीता !

आँखों की पीड़ा

नथुनों में उतरी

आँतों की पत्थरी

घुली नहीं

बूटियों का काढ़ा

कढ़ाई से रीता !

शिवालय से लेकर

बीहड़ तक उतरे

सोमरस सुभीतों की

पुश्तैनी मटकी में

भर भर के ताड़ी,

काले कपालों के

भीतर का भेजा

शिकारी रंगों में

कंठों तक डूबा

अँधा अनाडी,

अँडज पखेरुओं के

चूजों की

ऊँची उड़ानें

खोखल में सिमटीं

पूंछों में बांधे

गुलामी का फीता !

पेट और जनेंद्रियों के

इर्द गिर्द घूमते

वर्तुली सवालों के

चिरजीवी

प्रश्न पत्र पढ़ते

समय सार बीता !

आँखों की पीड़ा

नथुनों में उतरी

आँतों की पत्थरी

घुली नहीं

बूटियों का काढ़ा

कढ़ाई से रीता !

जगायेगा कब तक

बंजारा सूरज

सांसत में चंदा

चापलूसी के माहिर हैं

झिलमिल सितारे,

साधकों का चिंतन

संजीवनी

जाने न बकरा

सिलौंटियों में घिसे कौन

उठ कर भिनसारे,

गंगा नहाई

बैतरणी की बछिया

मवादों की धारा में

मछली सा डूबी

पगुराती

थूथुन भर लीले सुभीता !

पेट और जनेंद्रियों के

इर्द गिर्द घूमते

वर्तुली सवालों के

चिरजीवी

प्रश्न पत्र पढ़ते

समय सार बीता !

आँखों की पीड़ा

नथुनों में उतरी

आँतों की पत्थरी

घुली नहीं

बूटियों का काढ़ा

कढ़ाई से रीता !

तिलक तर्जनी लगाकर

अंगूठे दिखाते

बिदुरों को शकुनी

दूध भरी नदिया

फेक रहे पाशे,

चक्रव्यूह तोड़ते

मच्छर से मरते

अभिमन्युं

परसादी सा बांटते

कौरव अर्जित बताशे,

क्या करेंगे पीटकर

युयुत्सी

सोच के नगाड़े

झूठ मूठ कसमें

मठाधीश खाते

दाबे कखरियों में गीता !

पेट और जनेंद्रियों के

इर्द गिर्द घूमते

वर्तुली सवालों के

चिरजीवी

प्रश्न पत्र पढ़ते

समय सार बीता !

आँखों की पीड़ा

नथुनों में उतरी

आँतों की पत्थरी

घुली नहीं

बूटियों का काढ़ा

कढ़ाई से रीता !

भोलानाथ

डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में

अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर

जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत

संपर्क – 8989139763

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....

मन नहीं होता

कुछ कहने का

पाती क्या

भेजूं उज्जैनी ! 

सूखी है क्षिप्रा

राजकुवंर

खोज रहे

घाट बाट मृगनैनी !

कालीदास का

एकाँतवास

यक्षी

संवादों में उलझा,

पथ विचिलित

मेघदूतों का

वांक्षित संदर्भ

नहीं सुलझा,

आम्रकूट की

सुख छाया में

रगड़ रहे

हांथों की खैनी !

मन नहीं होता

कुछ कहने का

पाती क्या

भेजूं उज्जैनी ! 

सूखी है क्षिप्रा

राजकुवंर

खोज रहे

घाट बाट मृगनैनी !

अस्त व्यस्त

राजकाज

लोलुप दरबारी

अपनी ही साधें,

भोजपाली

लिफाफे

अनुमानी खिचड़ी

मुह में सब राँधें,

फिरका वयानों में

मस्त हैं

छोड़ कर

मर्यादा पुस्तैनी !

मन नहीं होता

कुछ कहने का

पाती क्या

भेजूं उज्जैनी ! 

सूखी है क्षिप्रा

राजकुवंर

खोज रहे

घाट बाट मृगनैनी !

वैताली व्यूह में

भूल गये 

सत्यवादी

राजा विवेकी,

लादे

पीठाहीं

छलतीं संज्ञायें

बंजारिन सी नेकी,

टूटी

कमर की 

खोज रही रैयत

खेतों में खोई हरैनी !

मन नहीं होता

कुछ कहने का

पाती क्या

भेजूं उज्जैनी ! 

सूखी है क्षिप्रा

राजकुवंर

खोज रहे

घाट बाट मृगनैनी !

भोलानाथ

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....

मन नहीं होता

कुछ कहने का

पाती क्या

भेजूं उज्जैनी ! 

सूखी है क्षिप्रा

राजकुवंर

खोज रहे

घाट बाट मृगनैनी !

कालीदास का

एकाँतवास

यक्षी

संवादों में उलझा,

पथ विचिलित

मेघदूतों का

वांक्षित संदर्भ

नहीं सुलझा,

आम्रकूट की

सुख छाया में

रगड़ रहे

हांथों की खैनी !

मन नहीं होता

कुछ कहने का

पाती क्या

भेजूं उज्जैनी ! 

सूखी है क्षिप्रा

राजकुवंर

खोज रहे

घाट बाट मृगनैनी !

अस्त व्यस्त

राजकाज

लोलुप दरबारी

अपनी ही साधें,

भोजपाली

लिफाफे

अनुमानी खिचड़ी

मुह में सब राँधें,

फिरका वयानों में

मस्त हैं

छोड़ कर

मर्यादा पुस्तैनी !

मन नहीं होता

कुछ कहने का

पाती क्या

भेजूं उज्जैनी ! 

सूखी है क्षिप्रा

राजकुवंर

खोज रहे

घाट बाट मृगनैनी !

वैताली व्यूह में

भूल गये 

सत्यवादी

राजा विवेकी,

लादे

पीठाहीं

छलतीं संज्ञायें

बंजारिन सी नेकी,

टूटी

कमर की 

खोज रही रैयत

खेतों में खोई हरैनी !

मन नहीं होता

कुछ कहने का

पाती क्या

भेजूं उज्जैनी ! 

सूखी है क्षिप्रा

राजकुवंर

खोज रहे

घाट बाट मृगनैनी !

भोलानाथ

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

पर्वत पहाड़ों को

काट काट 

बहती हैं

शदियों से नदियाँ 

जब तब

बदलती हैं धारा

छोड़ कर किनारा ! 

दमघोंटू उबाऊ

व्यवस्था की

जर्जर

संस्कारी छप्पर से

उकताई

पीढी को

कैसे कहें हम अबारा ! 

पुरखों के पुस्तैनी

इंद्र धनु

ऊँचे वितानों को

हमने

सूरज के आगे

उतारा नहीं,

साफ़ सुथरी

दीवारों की

ठाठों में

मकड़ों ने जाले बुने

पेट प्रजनन की आगी

धुयें को निहारा नहीं,  

गढ़ गढ़ के

विष कन्या

पौरुष निबल पर

आजमाते रहे

निमुआं निचोड़ा

हमीं ने

दूध सीकों का फारा !

पर्वत पहाड़ों को

काट काट 

बहती हैं

शदियों से नदियाँ 

जब तब

बदलती हैं धारा

छोड़ कर किनारा ! 

दमघोंटू उबाऊ

व्यवस्था की

जर्जर

संस्कारी छप्पर से

उकताई

पीढी को

कैसे कहें हम अबारा ! 

सूर्यरथी घोड़ों ने

जन्में हैं खच्चर

धर्मी विधिष्ठिर का

रथ क्या

खींचेंगे आँगे

दुशासन के पाले,  

अधोगामी अकेला

चिंतन विदुर का

अंधी सभा में

सियारों के

जत्थे हैं उधमी

बिन पगहा कैसे सम्हाले,

बकरी बयानों की

लफलफाई

भट्ठी में

जलते पितामह

सुनहरे वनों का

अक्षय शेर

बकरों सा हारा !

पर्वत पहाड़ों को

काट काट 

बहती हैं

शदियों से नदियाँ 

जब तब

बदलती हैं धारा

छोड़ कर किनारा ! 

दमघोंटू उबाऊ

व्यवस्था की

जर्जर

संस्कारी छप्पर से

उकताई

पीढी को

कैसे कहें हम अबारा ! 

गाँव शहर

कस्वों के

चौंरे चबुतरे भी 

मुर्दा से लगने लगे हैं

रोज जन्म लेते हैं

तक्षकों के बेटे,

किस्से कहानियों के

मड़राते प्रेतों की

शक्ल नहीं देखी

देखें हैं

अवसादी चेहरे

पीड़ा लपेटे,

आँखों के

कौले

निगाहों के तौले

कौड़ियों के

मोल बिके

बैताली बाबा

गुनियों ने गुलशन उजारा !

पर्वत पहाड़ों को

काट काट 

बहती हैं

शदियों से नदियाँ 

जब तब

बदलती हैं धारा

छोड़ कर किनारा ! 

दमघोंटू उबाऊ

व्यवस्था की

जर्जर

संस्कारी छप्पर से

उकताई

पीढी को

कैसे कहें हम अबारा ! 

भोलानाथ

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

अखबारों के

बड़े हादसे

शोर सराबा

दहशत गर्दी

पाल रही है

बांह में वर्दी

आने वाली

सुबह की छाती

होंगे बड़े बड़े विस्फोट !

महानगर की

महा सभा के

दरबारी हैं

चोर उच्चके

सभापति

बीहड़ के पाले

लील रहे

दुधमुँही चेतना

प्रतिबंधों की नातेदारी ओट !

नदिया किनारे

बूढ़े कहुओं की

पीठों से

सधी कुल्हारी

छील रही है

ताज़ा ताज़ा छाल,

बड़ी बड़ी

नाँदों के भीतर

पकेगी सड सड

चमर ठिकाने

धीरे धीरे

मरी गाय की खाल,

कई कई जन्मों की कल्पी

अथक साधना

चित्र केतु की

समझ न आई

चरर मरर

कंठों भर सिसकी

कदम कदम पर

झेले पनही

पानी पाथर चोट !

अखबारों के

बड़े हादसे

शोर सराबा

दहशत गर्दी

पाल रही है

बांह में वर्दी

आने वाली

सुबह की छाती

होंगे बड़े बड़े विस्फोट !

महानगर की

महा सभा के

दरबारी हैं

चोर उच्चके

सभापति

बीहड़ के पाले

लील रहे

दुधमुँही चेतना

प्रतिबंधों की नातेदारी ओट !

गांजा भांग

धतूर अफीमी

मदहोशी की गोली सी

जहन भरी है

जनम जनम की

जहर गुलामी,

दिनचर्या में

देह खपी है

देहरी देहरी

तरुआ घिस गए

कमर झुकी है

टूटे हाथ सलामी,

सूत्रधार चाणक्य चोटैया

उगली आग

बोर कर मिसरी

सावन मास की

अंधी आँखें

कैसे जानें

तपन जेठ की

मरुथल

मृग छलना की खोट !

अखबारों के

बड़े हादसे

शोर सराबा

दहशत गर्दी

पाल रही है

बांह में वर्दी

आने वाली

सुबह की छाती

होंगे बड़े बड़े विस्फोट !

महानगर की

महा सभा के

दरबारी हैं

चोर उच्चके

सभापति

बीहड़ के पाले

लील रहे

दुधमुँही चेतना

प्रतिबंधों की नातेदारी ओट !

मठाधीश

हो गए कसाई

आनन फानन

छोड़ मढुलिया

भैरों नाचें

क्षेत्र पाल के द्वारे,

भूत प्रेत बैताल के

बंधुआ पंडे

रहा कौन जो

कला बताये

देवी फिरें

विपत के मारे,

छद्मीं उत्सव

गाजे बाजे

यज्ञ आहूती

सन्यासी को

चली लुभाने

बहुरूपियों की फ़ौज

ले ध्वजा नारियल

लाल लंगोटी

चिलम खेत की रोट !

अखबारों के

बड़े हादसे

शोर सराबा

दहशत गर्दी

पाल रही है

बांह में वर्दी

आने वाली

सुबह की छाती

होंगे बड़े बड़े विस्फोट !

महानगर की

महा सभा के

दरबारी हैं

चोर उच्चके

सभापति

बीहड़ के पाले

लील रहे

दुधमुँही चेतना

प्रतिबंधों की नातेदारी ओट !

भोलानाथ

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं .

एक अरसे से

अपनी उनंगों के

साथ जिये

बेले की गंध सी

महकती आशायें !

काँटों के

वन की

बेपनही यात्रायें

छेदती रहीं पांव

अर्जित सुविधायें !

अपनी

जरूरत पर

मंदिर की मूरत पर

चड़ावे का

चलन चला ऐसा,

अपना कहा

करू हुआ

उनका

कल्पतरु हुआ

गंगा मैया के जैसा,

ओंठों पर

छद्मी मुस्कानों के

छंद लिये

बोलते रहे

मढते रहे घोषणाएँ !

एक अरसे से

अपनी उनंगों के

साथ जिये

बेले की गंध सी

महकती आशायें !

काँटों के

वन की

बेपनही यात्रायें

छेदती रहीं पांव

अर्जित सुविधायें !

हम लिखते रहे

गीत ग़ज़ल

गाते रहे करूणायें

दिवस

दुविधा में बीता,

साँझ ढली

रात में

दिखे नहीं

आँख में

घिनौची घड़ा रीता,

ठाठों में

बाँध रहीं

मकड़ियाँ लार लिये

बुनती हैं जाले

खींच कर सिरायें !

एक अरसे से

अपनी उनंगों के

साथ जिये

बेले की गंध सी

महकती आशायें !

काँटों के

वन की

बेपनही यात्रायें

छेदती रहीं पांव

अर्जित सुविधायें !

घायल हैं पनघट

चोटिल

पनहारियाँ

कुंठित है

भींगा आँचल,

घूँघट की

मृग्छ्लना

आँखों

चौकड़ियाँ

धोती हैं काजल,

आंशू हैं

अपनी आँखों की

शाख लिये

भीतर की लाज सी

सिकुड़ती व्यथायें !

एक अरसे से

अपनी उनंगों के

साथ जिये

बेले की गंध सी

महकती आशायें !

काँटों के

वन की

बेपनही यात्रायें

छेदती रहीं पांव

अर्जित सुविधायें !

भोलानाथ

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...खेल खेल जज्बातों से

खेल खेल

जज्बातों से

दिल

गिरगिट सा

रंग

बदलता है !

जैसे

मेले में

बच्चा

पाने को

हर चीज

मचलता है !

रंग बिरंगी

इस

दुनियां में

कौन से

रंग हैं अपने,

जाने कैसे

पहचानें

कैसे

हवा में

उड़ते सपने,

जब तक

सीने में

दिल है

देंह में

खूब

धडकता है !

कैसा

बंधन

कैसा रिश्ता

कैसा दिल से

दिल का नाता है,

समझ सका

न नब्ज

टटोली

न कोई किसी को

समझाता है,

देख देख कर

पढ पढ

चहरे

रट रट पन्ने

बहुत

पलटता है !

मनमाफिक

सीढी पर है

चाँद

आज का

आधा खिला हुआ,

सोई साँझ

रात की

गाथा

सपनों भरा

पराग चुआ,

कानाफूसी

हुआ

सबेरा

धूप में

दर्द

पिघलता है !

भोलानाथ

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत ! साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

सब स्वर लुटे

शिवालय सूना

गुमसुम विधुर दिये !

मर्माहत मन

गिने आलियाँ

अपने ओंठ सिये !

ढलता सूरज

आग का गोला

दूर क्षितिज के

पार गया,

नंगा नाच

हवाओं का

फसलें खड़ी

उजार गया ,

अगम अछूती

आँख व्यथायें

नागिन निठुर हिये !

काई फरती

मेहराबों पर

ठहरा

सहन अँधेरा,

सेंध लगाकर

देवालय में

तस्कर हुआ

चितेरा,

भाव बोध सब

अटल में डूबे

जगमग निपुर ठिये !

पूजा परछन

घींच कटी है

पीपर बरगद

छाती,

भजन आरती

वाले गुम्मद

घेरे हैं

कुलघाती,

धर्म अधर्म के

महासमर में

कैसे विदुर जिये !

भोलानाथ  

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !

साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

ऊसर कैसे

भई न जाने

अपनी धरती

उगे नहीं

ज्योतिर्मय बीज !

आस घुनी हैं

दिन हैं घायल

चन्दन ऊपर

चढ़ी बमीठी,

मान मनौती

की आशायें

आँखों सपने

जले अंगीठी,

आदिम श्रद्धा

पग पुरानी

महज रश्म है

भरम

भरी ताबीज !

मरी मानवता

उखाड़े खेमे

नागफनी

फलाव,

नंगी छाती

पीने कांटे

बढ़ता

हुआ दबाव,

दूर दृष्टि के

पस्त हौसले

मकड़ में

उलझ गई

अपनी तजबीज !

भोलानाथ

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