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‘गीतांगिनी’(1958) के प्रकाशन से पूर्व रचित राजेन्द्र प्रसाद सिंह के दो प्रतिनिधि नवगीत एवं एक कविता

शरद की स्वर्ण किरण बिखरी !

दूर गये कज्जल घन, श्यामल-अम्बर में निखरी !

शरद की स्वर्ण किरण बिखरी !

मन्द समीरण, शीतल सिहरण, तनिक अरुण द्युति छाई,

रिमझिम में भींगी धरती, यह चीर सुखाने आई,

लहरित शस्य-दुकूल हरित, चंचल अचंल-पट धानी,

चमक रही मिट्टी न, देह दमक रही नूरानी,

अंग-अंग पर धुली-धुली,

शुचि सुन्दरता सिहरी !

राशि-राशि फूले फहराते काश  धवल वन-वन में,

हरियाली पर तोल रही उड़ने को नील गगन में,

सजल सुरभि देते नीरव मधुकर की अबुझ तृषा को,

जागरुक हो चले कर्म के पंथी ल्क्ष्य-दिशा को,

ले कर नई  स्फूर्ति कण-कण पर

नवल ज्योति उतरी !

मोहन फट गई प्रकृति की, अन्तर्व्योम विमल है,

अन्धस्वप्न फट व्यर्थ बाढ़ का घटना जाता जल है,

अमलिन सलिला हुई सरी,शुभ-स्निग्ध कामनाओं की,

छू जीवन का सत्य, वायु बह रही स्वच्छ साँसों की,

अनुभवमयी मानवी-सी यह

लगती प्रकृति-परी !

(अज्ञेय द्वारा सम्पादित प्रकृति-काव्य संकलन ‘रूपाम्बरा’ से)

गा मंगल के गीत सुहागिन !

चौमुख दियरा बाल के !

आज शरद की साँझ, अमा के

इस जगमग त्योहार में,-

दीपावली जलाती फिरती

नभ के तिमिरागार में,

चली होड़ करते तू, लेकिन

भूल न,-यह संसार है;

भर जीवन की थाल दीप से

रखना पाँव सँभाल के !

सम्मुख इच्छा बुला रही,

पीछे संयम-स्वर रोकते,

धर्म-कर्म भी बायें-दायें

रुकी देखकर टोकते,

अग-जग की ये चार दिशायें

तम से धुँधली दीखती;

चतुर्मुखी आलोक जला ले

स्नेह सत्य ता ढाल के!

दीप-दीप भावों के झिलमिल

और शिखायें प्रीति की,

गति-मति के पथ पर चलना है

ज्योति लिये नव रीति की,

यह प्रकाश का पर्व अमर हो

तमके दुर्गम देश में ;

चमके मिट्टी की उजियाली

नभ का कुहरा टाल के !

(प्रथम कविता संग्रह ‘भूमिका’ 1950, भारती भण्डार, इलाहाबाद में संगृहीत)

विरजपथ

इस पथ पर उड़ती धूल नहीं ।

खिलते-मुरझाते किन्तु कभी

तोड़े जाते ये फूल नहीं ।

खुलकर भी चुप रह जाते हैं ये अधर जहां,

अधखुले नयन भी बोल-बोल उठते जैसे;

इस हरियाली की सघन छांह में मन खोया,

अब लाख-लाख पल्लव के प्राण छुऊं कैसे ?

अपनी बरौनियां चुभ जाएं,

पर चुभता कोई शूल नहीं ।

निस्पंद झील के तीर रुकी-सी डोंगी पर

है ध्यान लगाये बैठी बगुले की जोड़ी;

घर्घर-पुकार उस पार रेल की गूंज रही,

इस पार जगी है उत्सुकता थोड़ी-थोड़ी ।

सुषमा में कोलाहल भर कर

हँसता-रोता यह कूल नहीं ।

इस नये गाछ के तुनुक तने से पीठ सटा

अपने बाजू पर अपनी गर्दन मोड़ो तो,

मुट्ठी में थामें हो जिस दिल की चिड़िया को

उसको छन-भर इस खुली हवा में छोड़ो तो ।

फिर देखो, कैसे बन जाती है

कौन दिशा अनुकूल नहीं ?

इस पथ पर उड़ती धूल नहीं ।

(‘प्रथम कविता संग्रह ‘भूमिका’ 1950, में संगृहीत)

राजेन्द्र प्रसाद सिंह: ‘दिग्वधू’(1956,मधुरिमा साहित्य प्रकाशन, मुजफ्फरपुर)

घन-यामिनी

आधी रात, गगन में घन का मन्द-तरंगित सागर,

उठता लहक फेन-लेखा में बड़वानल रह-रहकर,

प्रतिबिम्बत उन्मथित भूमि का ह्रदय शून्य-दर्पण,

घोर वज्र-गर्जन सोया नीरव-नीरव धड़कन में,

भीत पुतलियों पर भावी की, सघन तिमिर घिर आया,

झूल रही तारों के मुख पर अंध प्रलय की छाया,

झंझानिल में उल्काहत हो डूबा शुभ्र सुधाकर,

आधी रात याद भी आती अब न चाँदनी दूभर !

फिर बह चला प्रभंजन यह अजगर के उच्छवासों-सा,

हर खद्योत-पुंज टकराता, भ्रम में विश्वासों-सा,

टूट छूटती चट्टानों-सी घड़ियाँ करवट लेतीं,

समतल के चढ़ते स्वप्नों को क्रूर चुनौती देतीं,

दादुर का स्वर : मौन अभावों का आकुल कोलाहल,

अर्थ-दनुज का स्वगत गहन झिल्ली के स्वन में केवल,

नव सुर-तरु का हर अंकुर फिर गरल-त्रास से प्यासा,

फिर वह चला प्रभंजन, उखड़ी नव विटपी-सी आशा !

घबराई बौछार झहर ‘टिन’ को जर्जर छतरी पर,

भहराई दीवार, गिरा बूढ़ी मानवता का घर,

खंडित होकर रहे पंक  में घुल-घुल प्राण-विसर्जन-

मिट्टी पर नभ के रंगों से अंकित चित्र चिरंतर,

बार-बार फुंकार रही नागिनी हठीली ऐंठी,

मृत मयूर की पांखो पर कुण्डली मारकर बैठी,

फिर भी मुझमें कौन कि जो मुझमें कहता धीरज धर,

‘घहराई बौछार किन्तु निशि भी ढल रही निरंतर !’

अपूर्णता

अनादि भाव-मेघ से भरा गगन,

अनंत कर्म-धार से भरी मही  !

मगर उभय दिशा-प्रसार में कहीं,

सुगंध आदि-अंत की न मिट रही !

सुगंध यह अमन्द, रूप-राशि की,

मधुर, परन्तु तिक्त भी, मदिर सदा !

अजेय मोह, दुर्निवार भोग की –

व्यथा-पुलक बनी अमूल्य सम्पदा !

अरूप से बँधा समस्त रूप है,

सुगंध आदि-अंत की बँधी हुई –

अखंड वृत्त-बीच द्रव्य-मंडली

विकास के प्रवाह में सधी हुई !

अटूट यह अदृश्य रज्जु-बन्ध रे !

अपूर्ण है  समस्त दृश्य की कला,

कुमुद कभी मुँदा, कभी मुँदा कमल,

दिनेश ढल गया कि चाँद भी ढला !

अपार भाव-कर्म के वितान में,

छिपी सजीव रत्न-सी अपूर्णता !

अशेष देश पर अशेष काल के

अशेष पाद-चिन्ह-सी अपूर्णता !

महापुरुष

ओ अकेला सूर्य ! तू कैसा उगा है !

गूढ़ अधियाली लपेटे थी जगत को,

ऊब-डूब असंख्य तारे कुलबुलाते थे घुटी सी साँस लेते,

बीतते थे क्षण, कि जैसे आप ही

गीला, बहुत ढीला, अमित काजल पसरता जा रहा हो

थिर हवा के श्याम गालों पर !

उन्ही बेचैन तारों की सदा अवरुद्ध इच्छाएँ सिमटती ही रहीं,

एक होने का, सदा बँटती रहीं,

और जब वे हो गईं मिल एक-हो उठीं साकार,

-एक रूपाधार,

-उठ पड़ा वह  चाँद, जैसे मौन दिशियों का अमल आहलाद,

तारकों का शुभ्र ‘मानस-पुत्र’ हास जिसका स्वप्नमय इतिहास,

चाँदनी वह, या कि छाई सृष्टि की ही प्यास !

कल्पना मन की लिए जब चाँद आया,

तारकों की पुतलियों का दाह भी वह बाँध लाया,

और, उसको ज्योति कह निज को लगा छलने,

तारकों का चाँद तबसे ही लगा ढलने !

और, तेरा दूत बन वह छिप गया निरुपाय,

वह अँधेरा भी छिपा ले नखत का समुदाय !

प्रकट केवल कर रह गया वह लोचनों का दाह जो कहला रहा आलोक,

तू तब ओ अकेला ‘चक्षु-पुत्र’ अशोक !

तू उगा था प्रथम ऋषि जनमा धरा पर,

देख पाया जो न, वह तम, उन सितारों को,

वह चाँदनी भी नहीं, सिर्फ शायद एक पीला चाँद,

प्रखर आशीर्वाद से अभिषिक्त करने को उसे ही, जग पड़ा है !

ओ अकेला सूर्य ! तू कैसे उगा है !

×           ×            ×

ओ अकेला शिखर ! तू कैसे खड़ा है !

अधजमे, ताजे धरातल में हुई हलचल,

प्रकृति की उथल-पुथल अथोर, तू सिकुड़न हुआ,

पर बन गया कैसे स्वयं विभ्राट,

यह संकोच का भी रूप खूब विराट !

हिम-मुकुट तेरा सुशीतल,

छू सुलगती धूप से ही तप्त स्वर्ण हुआ समुज्ज्वल,

मणिमयी वसुधा अनेकों रत्न, कौशल, शस्य से

अभिषेक करने को तुम्हारा, सज उठी,

निर्भर-निनाद अबाध गूँजा, कीर्ति की भी विजय-दुन्दुभि बज उठी !

चन्द्र-चूड़ हुए स्वयं तेरी गुफा में लीन,

धर्म की गंगा मुकुट पर हो चली आसीन,

बस गई अलका तुम्हारी गोद में,

‘कालिदासी’ निशि-दिवस कटने लगे आमोद में !

घाटियों के तरु, लता, तृण विहग, पशु, जन,

शिला-खंड सभी हुए चिरदास,

अंग-अंग अनंग-बालाएँ लिपटतीं

बादलों में लगीं रचने इन्द्रधनुषी रास !

तू उठा या प्रथम नृषति उठा धरा पर

धर्म, पौरुष धैर्य के दर्पी विनय सा,

जो सुरक्षा को उठाता ध्वंस की तलवार,

जिसने कर दिया जग को अरक्षित शंकनीय अपार !

‘एक’ की अधिकार-लिप्सा बन वाही तो

मनुज के उद्बुद्ध मन में भी गड़ा है !

ओ अकेला शिखर ! तू कैसे खड़ा है !

×           ×            ×

ओ अकेला सिन्धु ! तू कैसे भरा है  !

तू अनादि-अनन्त जग की चेतना का

ज्वार-लहरों  से भरा इतिहास रे  !

मनुजता के ज्योति-मण्डल में तरंगित,

चिन्तना का चिरअतल आवास, रे !

तू समस्त परम्पराओं को ग्रहण कर

महानदियों का महासंगम हुआ,

आत्मसात सभी रसों को कर गया; पर,

बोल, क्यों खारा सदैव स्वयं हुआ !

यह अकेला स्वाद युग-युग से धरा है !

ओ अकेला सिन्धु ! तू कैसा भरा है !

तू समन्वय, का अनोखे संतुलन का

रूप व्यापक,- अनल-जल, पीयूष-विष का हास !

रत्न, मणि-गण ऊर्मियों के दास !

स्थल सदा पद पूजता, वरदान बरसाता सदा आकाश !

तू प्रवाहों से सलिल को भर स्वयं में

चिन्तना के ताप से बादल बनाता –

छोड़ देता उन्नयन की राह में,

वायु की संधर्ष-गति से उलझते वे,

बरस जाते कहीं नीली शून्यता की छाँह में !

पर, कभी जो वज्र गिरता छूटकर,

भूमि हाहाकार करती फूटकर,

बीज उसका बिजलियों में, बिजलियों का बीज भी—

तेरे अचेतन में, कहीं दबकर पड़ा है !

क्या इसी कारण बहुत खारा, बहुत खारा—

अकेला स्वाद युग-युग से जड़ा है  !

ओ अकेला सिन्धु  ! तू कैसा भरा है !

तू चिरंतर, या चिरन्तर विष्णु का अवतार,

अग्रदूत मनुष्यता का जो रहा साकार !

किन्तु जो घिसकर सभी से और बँध कर भी

रह गया अपनी अनन्त अगाधता में मर्म से एकांत,

लग नहीं पाया गले कोई लिपट कर जो सका पहचान,

पूजता ही रह गया उसका सुखद पद-प्रान्त !

रस न उसका पी सका कोई पिपासु, अशांत !

स्वाद,--खारा स्वाद,

आत्म्बद्ध विशिष्टता का स्वाद,

शक्तिबद्ध स्वनिष्ठता का स्वाद,

बंधनों का एक खारा स्वाद,

दमित मन की बिजलियों का ह्रदय-हारा स्वाद,

स्वाद यह आतंक की दीवार बन

तेरे, जगत के, बीच निश्चल-सा अड़ा है !

ओ अकेला सिन्धु ! तू कैसा भरा है  !

आत्म-निर्माता के स्वगत

------ प्रथम निशीथ-----

इस महादुर्भेद्य तम से,

घोर निशि-सी म्लान घड़ियों में,

विकट संघर्ष कर, खुद हार, हाहाकार भर,

रुककर, तनिक विश्राम का जब व्यंग भरते प्राण;

कौन प्रकटा धूम-तन, कुछ दूर, बेपहचान ?

--शून्य की सिकुड़न पसीजी रच रही आकार,

झूमता बढ़ता चला वह आ रहा अनिवार,

पुतलियां कढ़ती हुई, कुछ लाल,

विहँसता निःशब्द ही, अकारण महाकंकाल  !

आ गया लो... आ गया वह पास,

आह ! आह !! असह्य बर्फीला तरल उच्छवास !!!

ओह ! तांबे-सी मढ़ी जलती हथेली इन भुजाओं पर,

बिजलियों की कँप– कँपी भर थरथराते होठ......!

अहे !... मेरे उच्च, पुंजीभूत, शत संकल्प  !

एक क्षण में दृश्य होगी अब, तुम्हारी हूकती-सी ढूह,

जिस पर मैं पड़ा रह जाऊँगा म्रियमाण –

मैं ......., मैं अभी निस्स्नेह दीपक-सा,

शिथिल, टिम-टिम, किसी का नित्य स्नेहाधीन,

ओ...! मत पूछ मुझसे प्रश्न,

मैं दीपक, दया के इंगितों पर जल रहा हूँ मौन,

आशा में, चिरन्तर एक आशा में !

लौटजा, ओ, लौटजा  मेरे निठुर कंकाल !

मैं पहचानता हूँ,-- तू सदा आता छिपा कमजोरियों में,

जिन्दगी भर, जानता हूँ –

“जत बार भयेर मुखोस तार करेछि विश्वास,

ततबार हयेछे अनर्थ पराजय...!”

-----छठवाँ निशीथ----

अमा-गगन की नभ छाया में जलाता दीपक-सा मन,

मेरे छितराए सपने सब ऊँघ रहे तारे बन  !

पंख मारती बार-बार कोई विहगी भरमाई,

अभी गई वह दो क्षितिजों तक, अभी लौट कर आई !

पूछ रहा है नीरवता से,-- क्या पहचान सकी मुझको तुम

पहली आतुरता से  ?....

किन्तु, नहीं वह बोली,

कुछ भी मर्म खुला न, विटपकी डाल नहीं टुक डोली !

अंधियारे से हार गया जग, दीप-शिखे ! मत रोना,

मेरा भी न, मगर तेरा तो पहचाना हर कोना !

है एक तरफ बेहोश पड़ी पीड़ा अगाध जीवन की,

दूसरी तरफ. मद-भरी कड़ी कामना विकल तन-मन की,

तीसरी तरफ भावना सजग जग के सम्बन्ध निभाती,

सामने कड़ी अपनी छाया, नस-नस में कील चुभाती !

जलना, गलना, हँसना, रोना,-- सब साथ-साथ कैसे होना ?

बेचैन बहुत पल-पल, छन-छन, जलता मेरा दीपक-सा मन !

तू काँप मत, मेरे ह्रदय ! झकझोरती मेरी झंझा छिपाए साँस में,

तू छिप न, ओ मेरे नयन ! काली घटा यह देख निज आकाश में,

अंतिम दिवस, अंतिम निशा, अंतिम घड़ी, यह आखिरी क्षण प्यास का;

लो काँपता पाषाण-पट अब फूटने वाला सुधा-निर्भर अनंत प्रकाश का !

लघु बाँह संज्ञा की अगर छू भी उसे पाती नहीं, तो मोड़ ले,

पलकें न रह पातीं खुली तो झुक, ठहर कर जोड़ ले !

तू बोल फिर मेरे अधर ! लेकर गहन मन की बिलखती रागिनी,

----अब फेक दो वंशी मधुर, दे छोड़ जीवन-वृक्ष लिपटी नागिनी !

दो स्नेह चिर संतोष, इच्छा को सफल विश्वास दो,

पावन करो तन-मन, प्रभो ! आशा-वसंत-विकास दो !

नवाँ निशीथ

लो निज स्नेह-शरण में !

बहुत दूर से स्वर भरता हूँ सोयी स्वर्णकिरण में !

तन की यह बेसुध गति मन को

तुमसे दूर लिए जाती है,

संकल्पों के हर प्याले को

पथ पर चूर किये जाती है,

लुटजाता भर गरल तृषा में

मधु-संबल नूतन चिरसंचित;

भर-भर उठती विकल शिथिलता मेरे चरण-चरण में !

लो निज स्नेह-शरण में !

संधि-निमिष में पग-ध्वनि गूँजी,

नव रसवन्ती संध्या आई,

सरल साधना, -चपल किशोरी,

यौवन के पल में अलसाई !

सघन तिमिर छाने से पहले

उज्ज्वल निर्मल इन्दु उगा दो,

राख बने सपने फिर नाचें शीतल ज्योति वरण में !

लो निज स्नेह-शरण में !

जब-जब असित घटा घिर आये

पाकर इंगित अंध अमा का |

तब-तब नभ से ले करतल पर

दीप जला दो ध्रुव तारा का |

प्रात द्वार तक चलता जाए

प्राण-पथिक निज राज सुनाता,

पाने को प्रतिबिम्ब तुम्हारा स्वर्णिम सौम्य मरण में !

लो निज स्नेह-शरण में !

दसवाँ निशीथ

प्लावन करो ज्योति का व्यापक,

अन्ध प्राण-धारा में,

अब न ह्रदय बंधने का इच्छुक

कभी शाप -कारा में,

ज्ञान विकल, निष्काम कम की

मधुर, दिव्य अर्चा को,

अब न और दबकर रहने दो

अंतर की चर्चा को,

भय -कम्पित यह विनय पराजित

अपनी क्षुद्र प्रणति से,

किन्तु असंशय मन कहता—

‘सब हैं केवल अनुमति से !’

किन्तु जन्मों की विकट पाप का

पल है घृणा तुम्हारी ?

देव ! उबारो सर्वनाश से,

तुम जग के अधिकारी !

माना ; --मोह प्यास जीवन की,

पर न सत्य से कम है !

कैसे कह दूँ – धूप-छाँह यह

केवल पथ का भ्रम है !

पन्द्रहवाँ निशीथ

‘…….

ले रह हूँ मै

तुम्हारी क्षमा का सौगंध,

मेरी यह प्रतिज्ञा अब न टूटेगी,-

कि जीवन में रहोगे लक्ष मेरे

एक—‘तुम’—

एक ‘तुम’ केवल !

कि मेरी राह पर सुख और दुख में मुसकुराओगे,

साथ दोगे, मौन हो संवेदना दोगे

हँसी के,--आँसुओं के निमिष में,

एक तुम केवल !

मै सदा पहचान लूँगा – एक तुम केवल !

ह्रदय मेरा, सभी अनुभूतियाँ मानव-सुलभ, लेकर

तुम्हे ही सौप देगा, प्रेम से विह्लव !

इंगित तुम्हारा ढूंढ लेगी, साधना मेरी,

निरंतर काल की गति में |

मेरे कर्म नित्य सतत तुम्हारे विश्व का

चिरधर्म पालेंगे

मेरी कामनाएं तुम्हें करने का ह्रदय में पूर्ण बिम्बित – रहेगी चंचल !

मेरे प्राण, जीवन में, तुम्हारी स्वर्ण-वर्ण अनेक

छाया मूर्तियों में लिपट होंगे लीन,

तुम मे, एक केवल तुम, कि जो कण और क्षण में

बस रहे हो, रस रहे हो !

मै तुम्हारा दास – मै, जो एक मै केवल,--

मगर प्रतिनिधि सभी का !

ओ निखिल अनुभूति-रूप महान !

जय हे ज्योति-निर्झर, जय, अतलता-उच्चता के

व्याप्तिमय सोपान !

जय अनुभूति-रूप महान !!!

दिग्वधू

नील शून्य यह किमाकार

निष्कूल पारदर्शी रत्नाकर एक अचंचल,

फहराता रहता उस पर लय- ताल- मुक्त यह,

ओ रहस्य रमणी ! अज्ञात तुम्हारा अंचल !

नन्दन वन के सतरंगे वे चपल विहंगम,

जिनके झड़े हुए पंखों से निर्मित, कोमल—

फूले तूलाकार प्रसूनों से बहु गुम्फित,

सिन्धु फेन के रजत-स्वर्ण गुच्छों से मण्डित –

ओ दिग्वधू ! तुम्हारा अंचल, फहर-फहर पर तड़ित्तार सब झलमल,

अस्तित्वों के मनोभाव झलकाते पल-पल !

अक्षर, अमल,अपश्य पूर्णविधु परम व्योम में,

कुसुमाकर के राग-दीप उन्मद आनन्-सा,

दिव्य मधु-श्री बरसाता-सा भुवन-भुवन में

उसकी तुम उन्मत्त चकोरी तृप्तिशालिनी !

उच्छवासों से रह-रह अनिल-तरंग उठाती,

लीला भरती शून्य-सिन्धु की लहर-लहर में –

चिर अखंड ‘वह इन्दु-बिम्ब’ लेकर अंतर में,

खेल रही जो, प्रमन-प्रमन अपने रत्नों से !

मुसकाते से द्योतित करती रहती निशि-दिन,

ग्रह-पुंजो के महारत्न तुम, ज्योतिचारिणी !

उस निर्मल राकेश-रश्मि-रंजन से पुलकित

सतरंगी यह खिली कुमुदिनी वनी मेदिनी,

उस पर खड़ी हुई मायाविनी ! तुम एकाकी,

अपने मर्मी नयन दिव्य अंजन से सारे,

कोमल अरुण चरण से छू-छूकर बन जाते

साँझ-उषा की जल परियों के पट रतनारे !

ऋद्धि-सिद्धि, शारदा और श्री : सखी तुम्हारी,

नित्य गूंथती नव सुगन्ध से उर्मिल वेणी,

चन्द्र-बन्ध सज देती उस पर सुर-बालाएँ,

बाल-सूर्य का भाल-बिंदु वह, नित्य लगा जाते हैं देव कुमार

द्वादश रूद्र किरीट जड़ित हो दीप्त स्वयं साभार |

विद्याधर,गंधर्व, यज्ञ सब घेर-घेर कर कुसुम-वृत्त में

उड़ा रहे अभ्रक - तारक अनिवार !

तुमने दिव की ओर –

सहसा फेरी सहज दृष्टि ही अर्धार्निमीलित; जैसे मधु में बोर –

सपनों का दे खोल, वनज-वातायन कोई, या पलकों की कोर !

देख-देख साकार विभा अब अपने अयुत नयन की घन उन्माद-तरंग में

तिरता-सा इंद्र आ गया, झुका, चरण-तल अर्पित कर ऐश्वर्य सृष्टि का,

व्रज नाद से जो रक्षित-सा रत्नच्छाया-भार !

सहज मदिर आकर्षण से ही अंध- अवश हो,

आये वरुण, कुबेर, अग्नि, यम, पूषा --सारे

लाये अपनी महाशक्तियाँ शीतल-दाहक –

सब अर्पित कर, भूल गए अपनी सत्ता भी;

जैसे सब बंध गए तुम्हारे मौन रूप की ज्वाल-माल में निःसंकल्प, निरीह !

तुमने सहसा चल चितवन के विज्जु-वाण से

भेद शून्य की नीरव छाती, हास-मुखर कर,

बरसाई झड़ते मधु-कण से शत छायाएँ –

शब्द-रूप-रस-गंध-स्पर्श-चंचल अप्सरियाँ ;

शची और रति के निर्देशन पर बल खाती,

नृत्य, नाद, लय,गीत,ताल से हर्ष मनाती –

दिग्मंडल के प्रथम-प्रथम अवतरण-क्षणों में

प्रकटा जो चिर तरुण, दशमुखी ज्योति-ज्वार सा,

पृथ्वी के जीवन-पथ- चुम्बी उद्ध्रर्व द्वार-सा !

शब्द-रूप-रस-गंध-स्पर्श-चंचल अप्सरियाँ ;

लगी नाचने साथ-साथ, उर्वशी, मेनका, रम्भा, आदि

कि अगणित गति-विह्लव किन्नरियों,

सब छाया रंगिणी विभा में !

गूँज उठी जीवंत मूक गति, दिग्दिगंत में निःस्वन !

अश्रु-हास-स्वर, कलरव, मर्मर, कल-कल, छल-छल,

घहर-घहर, झन-झन, गर्जन ...में पग-ध्वनि गोपन,

जीवन के श्रम और विराम विषम सम बनकर

कब से उनके नूपुर से विच्छुरित, सनातन !

कोलाहल की स्वप्न-मूर्तियों का विराट संगीत—यह नीरव, गोतीत;

तुम जिसकी स्वामिनी, आत्मा-परिणीता, प्रेमातीत !

त्रिपुर-सुन्दरी, प्राण- अप्सरी, सृष्टि-स्वप्न की रानी,

अवगुंठिता,रहस्यमयी तुम, रूप-शिखा कल्याणी !

पर, किस मोह-मदिर, सुधि-हारी इंद्रजाल से

सबकी है बँधगई  दृष्टियाँ निज में खोई ;

तुमने बाँध दिया किस व्यापक मन्त्र-दाम से

यह हिरण्य-अनुभूति-जाल उड़ता धरणी का !

अमिट गहन सम्मोहन निद्रा-सी फैलाकर,

भटकती कण-कण को तुम लीला-स्वप्नों में !

नाश और निर्माण मौन इंगित पर चलते,

नियति-रूपिणी चपल उंगुलियों के कंम्पन पर

गर्व खर्व होता अलक्ष्य-विजई मानव का !

वंकिम भ्रू-संकेत बुद्धि के भ्रम-जालों में

उलझा देता ऋजु श्रध्दा की मणि-माला को,

भाल-रेख की चल गहराई मानव-मन को महाभंवर में चक्कर देती,

लक्ष्य-भ्रष्ट कर सदा-सदा से, दिग्भ्रम में हर रोज घुमाती,

कर देती ध्रुव-हीन, यही तुम्हारी क्रीडा, ओ निष्ठुरे ! स्वयं में लीन

दिग्वधू ! अरूप अनामा, ओ मूल शक्ति अभिरामा !

स्वर्भू की चिर प्रेयसी दिव्य तुम स्वयं चिरंतर श्यामा !

पर, कमी चलेगा पुष्प-यान पर मनुष्यत्व अवरोध-हीन

भुज खोल, तुम्हारी ग्रीवा में वरमाला डालने को, संगर्व,

रा ! तुम्हे बनाने को निसर्गिनी वामा  !

राजेन्द्र प्रसाद सिंह : ‘आओ खुली बयार’ (1962,नवगीत संग्रह, अल्फ़ा-बीटा पब्लिकेशन्स, कोलकाता)

1. लहरों में आग रुपहली,

ओ S S पुरवाई !

एक मौन की धुन से

हार गई शहनाई ।

जामुनी अंधेरे की,

गजरीली बाहों में,

एक नदी कैद है निगाहों में ।

रूठ नहीं पाती-

इन साँसों पर झुकी हुई परछाई ।

चाँद बिना आसमान

डूब गया धारा में,

लहक भी न उठती

तो हाय ! क्यों न बुझती

अब इन ठंडे शोलों की अंगड़ाई

                           2.   ढँक लो और मुझे तुम,

अपनी फूलों सी पलकों से, ढँक लो ।

अनदिख आँसू में दर्पण का,

रंगों की परिभाषा,

मोह अकिंचन मणि-स्वप्नों का

मैं गन्धों की भाषा,

ढँक लो और मुझे तुम

अपने अंकुरवत अधरों से ढँक लो ।

रख लो और मुझे तुम,

अपने सीपी-से अन्तर में रख लो ।

अनबुझ प्यास अथिर पारद की,

मैं ही मृगजल लोभन,

कदली-वन; कपूर का पहरू

मेघों का मधु शोभन ।

रख लो और मुझे तुम

अपने अनफूटे निर्झर में, रख लो ।

सह लो और मुझे तुम,

अपने पावक-से प्राणों पर सह लो ।

मैं हो गया रुई का सागर,

कड़वा धुआँ रसों का,

कुहरे का मक्खन अनजाना,

गीत अचेत नसों का,

सह लो और मुझे तुम,

अपने मंगल वरदानों पर सह लो ।

                                                     3. आज संस्कारों का अर्पण लो !

गुहा-मनुज मुझ में चुप/प्रस्तर–युग मौन,

धातु-छंद से मुखरित/करतल-ध्वनि कौन ?

मध्ययुगी रक्त-स्नात यौवन का दर्पण लो !

आधुनिक मनुज मेरे/नख शिख में लीन,

विद्युन्मुर्च्छिता/धरा में यंत्रासीन,

‘इहगच्छ, इहतिष्ठ’- अजिर का समर्पण लो ।

लो, अब स्वीकारो यह व्यापक सन्देह,

अपने प्रति शंका का उद्वेलित गेह,

विगत के कुशासन पर आगत का तर्पण लो

आज संस्कारों का अर्पण लो ।

राजेन्द्र प्रसाद सिंह : ‘रात आँख मूँद कर जगी’  (1980,नवगीत संग्रह ,सहलेखन,दिल्ली)

1 . रात आँख मूँद कर जगी

रात आँख मूँद कर जगी है,

एक अनकही लगन लगी है,

मैं नयन बनूँ,

- पवन बनूँ,

गगन बनूँ,

कि क्या करूँ ?

मुसकेंगे होंठ नहीं,  खिँचेंगी  न भौंहें,

-ऐसी मुश्किल !

चुपकी रह जाएंगी गर्वीली सौहें ,

- कैसी मंजिल !

… जो निहारता रहे,… बने दर्पण,

… परसे ; तो हो जाए परछाई,

… अपनाले, वही  झील बनजाये ;

साँस भाव-गन्ध में पगी है,

गन्ध नील रंग में रँगी है,

मैं नशा बनूँ ;

-तृषा बनूँ ,

- दिशा बनूँ,

की क्या करूँ ?

सिहरन भी रूठेगी,घिरेंगे न सपने,

अब क्या होगा ?

रागिनी शिराओं में लगेगी पनपने

- तब क्या होगा ?

…भरमा दे इसे,-वह कुहासा हो,

… दहकादे,-आतिशी तमाशा हो,

… घेर ले,-वही सागर बन जाए;

चाँदनी बिछी ठगी-ठगी है,

आस पंख मारती खगी है,

मैं चँवर बनूँ ,

-भँवर बनूँ,

-लहर बनूँ ,

कि क्या करूँ ?

मुँदी हुई पलकों में बेरूखी अजीब

या बहाना है ?

जागती पुतलियों में चिंता की बात

याकि ताना है ?

…जो अधीन हो,--रहे विटप बनकर

… त्रासदे-अशुभ पंछी बन जाए,

ले जाये बहा,- वह अंधेरा हो !

शायद मनुहार दिल्लगी है,

रात तो अभाव की सगी है,

मैं क्षुधा बनूँ,

- विधा बनूँ,

-सुधा बनूँ,

की क्या करुँ ?

2.  फूल केवड़े का

एक अदद फूल केवड़े का

कहाँ तक बचाकर मैं लाया,-ले आया !

बागीचे में अपने हाथों बचपन के-

काँटों  से ढँका फूल तोड़ लिया नमके ;

दरवाजे सजा दिया, थी निगाह सहमी,

खुशबू से मँह- मँह करती गहमागहमी ;

पर्व सभी पुलके, त्यौहार हुए ताजे,

हवा में उगे पंजे लिए सौ तकाजे !

...आँधी,...भूकंप...अगलगी में

घर छूटा, दर छूटा,छूटा बगीचा ;

बिस्तर ने कभी,कभी मंदिर ने खीचा !

निर्वासित फूल केवड़े का

बचाकर यहाँ  तक मैं लाया,-ले आया !

नाते-रिश्ते के दोमुँहे दोरुखे से-

हाथों-हाथों  गुज़रा फूल झरोखे से;

अंजुरी में बँधा उधर,अंतर तक दमका,

माथे से लगा इधर,शोणित में गमका;

हर तनाव झेल गया युवा-हथेली पर,

पखुरियाँ नोचने  बढ़े सारे वनचर |

...साज़िश,...कानून,...दुश्मनी से

ताश के महल टूटे,धीरज-फल टूटे;

आसरे-भरोसे के सारे पुल टूटे !

यों आहत फूल केवड़े का

यहाँ तक बचाकर मैं लाया,-ले आया !

निजी स्वप्न ढूँढता परायी आँखों में,

गंध-गुण सिरजता तितली की पाँखों में

गदराया जो पराग कोश से समय के-

लाँघ गया लावे की नदी साथ लय के,

मौसम ने जंगल फौलाद के उगाये;

छुआ,तो सलाखों में बौर निकल आये!

-मरूथल से, कई पठारों से-

गुज़रा जो, सूख गिरे दल सभी कटीले ;

बरसे, आखिर बरसे मेघ भी रसीले !

दूरागत फूल केवड़े का

वहाँ से तुम्हीं तक मैं लाया,-ले आया !

3. पूर्णिमा की रात में

पूर्णिमा की रात में यह

मधुर  आमन्त्रण !

शरद के आकाश में-

धूमिल, सजल घन खो गए,

चाँदनी के पलक-तल

थककर नशे में खो गए |

उतर आए दूत

पेड़ों के चँवर झलते ;

खिल उठे सन्देश पाकर

आगमिष्यत् क्षण !

दर्पणीया नदी में

चुपचाप बिम्बित नीलिमा,

चित्रणीय कगार पर

संभाविता की भंगिमा,

हंसी की-सी गूँज

फलियों-भरी फसलों में,

साँस में घुल रहे चन्दन-

के अचीन्हे कण !

मैं न जानूँ किस तरह

ये पाँव उठते जा रहे,

बेखुदी में पास के

परिदृश्य बदले जा रहे !

दीप ढँककर बुझा

ऐपन–कृत हथेली से ;

हो उठे सहसा सिंदूँरी

चाँद के लोचन !

4.   तो अकेला मैं नहीं .....

साथ मेरे चल रही है

इत्र में डूबी हवा ...

तो अकेला मैं नहीं हूँ  !

आज कितने बाद जुड़े-सा बँधा मन

आज अँजुरी फूल-सा

हल्का हुआ तन !

धमनियों में बज उठी है

शरद-पूनो की विभा...

तो अकेला मैं नहीं हूँ !

अब गगन है  रेशमी आँचल रूपहला

तारकों में प्यार का

रोमांच पहला !

चाँद के हँसते नयन में

बनगयी काजल घटा...

तो अकेला मैं नहीं हूँ !

चाँदनी आसंग में खिलती हँसी है

चूड़ियों की खनक-

मर्मर में बसी है !

झील के सौ टूक दर्पण

में किसी का चेहरा...

तो अकेला मैं नहीं हूँ !

सीढ़ियाँ कर पार वर्षों की निमिष में,

मैं खुली छत पर खड़ा

ठंडी तपिश में !

बाहुओं में बँध गई-

अनटूट शीशे की लता...

तो अकेला मैं नहीं हूँ  !

5.  समय की भी तुला पर

पुतलियों में बंद

नीली चिठ्ठियों के होंठ

सहसा खुल गये ;

गोल-घूमी राह पर हम मिल गये !

दस्तकों का सिलसिला

टूटा किसी आवाज़ से

तड़पती कड़ियाँ बजीं

दिल के झनकते साज़ से

हथेली पर उठे

स्वागत के अपरिचित फूल

माथे चढ़ गये ;

जिधर फ़व्वारा,उधर हम बढ़ गये !

रिमझिमी सतरंग छतरी-

लिये,बिजली घेर कर-

नाचती रंगीन शीशों

के बटोर ढेर पर,

चार बाँहों बीच

कितने अन्तराल अथाह

खुद ही भर गये;

सटे दुहरे सूर्य-से हम जुड़ गये !

देखते  ही देखते

सड़कें हुई नदियाँ

तैरते ही तैरते-

लौटीं कई सदियाँ;

बन्द पलकों कसे

सागर-पाखियों के पंख

भीतर खुल गये;

हम समय की भी तुला पर तुल गये !

6. अपना हार पिरोलो

- खोलो जी,

सुबुक नयन खोलो !

वातायन से किरणें झाँकें,

तम-प्रकाश के आखर आँकें,

जगा ज्योति की प्यास रातभर

लौएँ राह विदा की ताकें !

फूल करें मनुहार कि पाँखें

ओस-कणों से धोलो !

-खोलो जी,

तृषित नयन खोलो !

यह उजड़ा-सा  नीड़ तुम्हारा,

बस,टूटा-सा पेड़ सहारा-

सौ तूफानों से लड़कर भी

जो न कभी भीतर से हारा

डालें कहतीं सुधा-पान को

विष से होंठ भिगोलो !

-खोलो जी,

गहन नयन खोलो !

किसकी भौहों में थी बाँकी-

भावी इन्द्रधनुष की झाँकी ?

वह दुख की आँधी में खोयी,

तुम अबतक उड़ते एकाकी !

बदलो,पंछी से माली बन

अपना हार पिरोया !

-खोलो जी,

विशद नयन खोलो !

7. कथा पिछले जनम की

इसी जीवन में मिली

पहचान जो अपनी कभी;

आज सचमुच हो चली

वह कथा पिछले जनम की !

धुन्ध के उस पार भी

तब दीखते थे रंग सब ;

चिलचिलाती धूप  ने

रंगान्ध पूरा कर दिया !

अब सभी कुछ हुआ काला याकि उजला

तीसरा हर पक्ष उसने हर लिया !

इस हथेली में चुभा

था-चाँद:टूटा आइना ;

आज सचमुच हो चली

वह व्यथा पिछले जनम की

दूँ सभी कुछ से न कम,-

जो ले चुके यह मूल्य भी,

थे उन्हीं के तथ्य, जो

अब सत्य मेरा गढ़ चुके |

कुछ नहीं अपना बचा इन मुठ्ठियों में

-यह किताब खुली हुई,-सब पढ़ चुके !

कल्पबेलि कभी झुकी

थी पाँव पर, बन प्रार्थना ;

आज सचमुच हो चली

वह प्रथा पिछले जनम की !

धूप ने धोया जिसे

उस धुन्ध से ही पुत गई ;

अँधेरा सतरंग हो

उजले ठहाकों से धुला |

रंग-पथ पर खास गन्ध उरेहता जो

वही मौसम-तीसरा पख हो चला !

इन्द्रधनु सचमुच पड़ा

था वक्ष पर गलहार बन;

हो चली अनुभूति वह-

अन्यथा पिछले जनम की !

8. प्यार नहीं तन का बन्दी

प्यार नहीं तन का बन्दी

तो मन का भी

कैदी वह कैसे ?

रँग बिना श्रीहीन सुरभि सब,

गीत बिना झंकार अधूरी ;

फिर भी केवल रूप-तृषा से

हो पाती यह प्रीति न पूरी !

नज़रों पर दिल के जादू से

एक नशा-सा चढ़ जाता है ;

मिट-मिट जाती सरस विभा में

वह अपरूप-रूप की दूरी !

स्वप्निल,सहज प्रणय की प्रतिमा,

जग न कभी हो पाता वैसा ;

रूप न नयनों का बन्दी

तो दिल का भी

कैदी वह कैसे ?

छिछला नेह देह-शोभा का,

दरस-परस अनिवार नहीं जी !

प्रेम कभी तन की दूरी का

मन पर  दुर्वह भार नहीं जी !

अंत:पुर में जो लय बजती

वह बनती द्वारों की भाषा

यह अनुराग राग जीवन का

लोलुप का उद्गगार नहीं जी !

रोम-रोम में गति की यति भर

संयम पाता तोष निरंतर ;

तोष न बाहर का बन्दी

तो भीतर का

कैदी वह कैसे ?

खूब रहे ये प्रश्न अनोखे,

-खुद ही बाँध लिया अपने को !

सत्य पुकारे दिशियों में खुल

फिर क्यों दुलराना सपने को,

‘निज’ से ‘पर’ की ओर चले जो,

उसका तन भी मन बन जाता;

सुलग रही बन आगी जो,

उसकाती रहती तपने को !

‘एक’ निरर्थक है,जब तक वह

आप ‘अनेक’नहीं बन जाता;

मर्म नही मति का बंदी

तो गति का ही

कैदी वह कैसे ?

9. बात क्या हुई, कैसे आये ?

पाहुन, चुपचाप खड़े हो नजर झुकाये;

--बात क्या हुई कैसे आये ?

आगे आने में

यह रेतीली कुटिया,

पीछे जाने में

हरियाली की नदिया;

पार के दुआरे पर

काँपती अँगुलियों में

मचलती सिमटने को

एक पूल बगिया....

कागज की डोंगी पर चलो बेकिराये

पहचानी गंध रंग लाये !

यहाँ नहीं मेरी

धड़कनें वहाँ सुनना;

रोज ही सिहन्ता के

शब्दों को गुनना;

बदली ऋतु-शोभा का

आये मेहमान जभी,

दूर, निकल कोई

आभार-गीत बुनना !

सडकों का नंगापन शायद ढँक जाए;

--छनी-छनी धुन स्वरुप पाए !

वहाँ नहीं चलना,

तो रुको नहीं आओ;

छूना है मना, जरा

चेहरा उठाओ.....

लालिमा दुआरे की;

पीयरी दिआरे की,

कलिमा किनारे की

--पीकर मुसकाओ !

हँसी से धुआँ का रंग बदल जाए

-छुई-छुई हवा लौट आये !

                               10.लाख जतन

लाख जतन

जानकर किये;

पावों के रुख पलटें कैसे ?

--इतने दिन साथ हम जिए !

एक परत टूट गयी

समय की हँसी से,

दूसरी परत हमने

तोड़ दी खुशी से,

--अनहोना हो गया इसी से !

लाख जतन

जानकर किये;

मीठे मुँह तीते हों कैसे ?

--झूमें हम साथ बेपिये !

एक राह छूट गयी

हवा के ज़हर से,

छूट गयी दूजी

पछतावे के डर से,

--अनसोचा हो गया असर से !

लाख जतन

जानकर किये ;

फूल बिंधे अब लौटें कैसे ?

--सासों में गूँथ जो लिये !

रंग-गाँठ कसी रही

शोणित की लय में

गंध-गाँठ खुल आई

पूरक विनिमय में !

-फल गयी सचाई अभिनय में !

लाख जतन

जानकर किये

पत्थर कह झुठलाये कैसे –

रतनों के मोल जो लिए !

एक छाँह सुलग उठी

बर्फ़ की नदी में,

एक छाँह बरस गयी

जलती घाटी में,

--जानें, क्या पैठ गया जी में !

लाख जतन

जानकर किये;

बादल ये फट जाएँ कैसे ?

आँचल के साथ जो सिये !

11. दूधिया दीवार

दूधिया शीशे की दीवार

चारों ओर है !

कैसे जाएगा उस पार

फोकस अन्दर से ?

कैद सन्नाटे का आकार

बाहर शोर है !

यह देह नहीं,--बैलून

यों हो फिसल रहा;

मन नहीं, घिसा नाखून

शीशा खुरच रहा;

गूँजे किसके नाम पुकार

दमघोंटू घर से ?

अजब वातायन जालीदार

ध्वनि का चोर है !

जो लाये थे सोपान,--

गुम्बद से लौटे;

भूले सारे अहसान

दरवाजे छोटे

आये अब कोई झंकार

कैसे बाहर से ?

रतनबटुए का यह संसार

आदमखोर है !

लो, पंखे की भी हवा

गरम होने लगी;

खबरों की भी कल्पना

गूँजे, खोने लगी;

कैसे शीशे का यह द्वार

टूटे मर्मर से ?

रुद्ध हो गई समय की धार,

सिर्फ हिलोर है  !

12. इतनी आवाज़ों के

बाबजूद कैसे

पूरा आसमाँ चुप है l

गीत उमगे जहाँ,

वे रास्ते खोये ;

थी कहाँ मंजिल कि जिसके वास्ते खोये !

रात आधी –बर्राती ,

भोर भी खट-पट लाती ,

दनदना रही दुपहरी,

तमक तड़की घर्राती,

शाम की हँसी खनकती,

रात सुख-दुःख को गाती !

अजब साज-बाजों के

बाबजूद वैसे

पूरा कारवाँ चुप है!

प्रीति उपजी  जहाँ ,

वे क्यारियां खाली ;

बीज उन्नत का ठेका ले रहे माली !

बहसें हर ठौर ज़ारी,

सब पर धमाके भारी ,

जाती ‘सुनहरे कल’ तक

लौटरीवाली गाड़ी

झूठ नारों के सदके !

लूट-मारों के सदके !

गज़ब, ,हर प्रसारण के

बावजूद जैसे-

पूरा आशियाँ चुप है !

भरी सड़क पर (1980,सहलेखन,नयी दिल्ली )

1.     भरी सड़क पर

कुमकुमे जले हैं,

कोई सुई हम

ढूँढ़ने चले हैं.

गुज़र गए हैं जो धूल के बगूले,

सिकुड़ गए जो दीवार के फफोले,

--कौन उनके लिए चुका रहे’’,

बरस-बरस ये

कलेंडर खाली हैं,

कोई घड़ी हम

ढूँढ़ने चले हैं,

गले-गले यह जंजीर जो बंधी है;

गठरी गूदड़ की पीठ पर लदी है,

--कौन ढोता इन्हें झुका रहे’’’,

हथेलियों पर 

आइने ढले है,

कुतुबनुमा  हम

ढूँढ़ने चले हैं,

न साथ देंगे जो पैर आँखवाले

कटे रहेंगे जो हाथ पाँखवाले,

--कौन उनसे जुड़ा रुका रहे...,

सवारियों  के

मील-दर खुले हैं,

कोई मुहर हम

ढूँढ़ने चले हैं,

               2. ना साधू-ना-चोर

          ओ भैया, - ना साधू—ना चोर

हम मुंह्जोर—झुग्गीवाले,

चटकल की चमनी ने आज तरेरी आँखे,

मिल की भट्टी आग-लहू का भेद मिटाती,

करखनिया मजदूर

इकट्टे हिम्मत से भरपूर

नशे में चूर,--कबीरा गाते’’’

ओ भैया, -- ना साधू—ना चोर

हम शहजोर---ढाबेवाले,

नाम धरम के पेट पालते भीख माँग जो,

या जो खेलें जुआ, पसीने से, पूंजी का,

दोनों धोखेबाज़,

लड़ाकर हमें भोगते राज,---

खुला यह राज, सामने सबके,

ओ भैया,--ना साधू---ना चोर

हम कमजोर गांठोंवाले,

दलदल में धँस नदी-समन्दर में भी डूबे,

दबे नींव में, दीवारों में चुने गए हम;

छत से फिसले, गिरे,

पहाड़ों-खानों में फँस मरे,

कैद में सड़े—नाम पर श्रम के,

ओ भैया, ना साधू—ना चोर

हम पुरजोर पुट्ठोंवाले,

3.अजन्ता मिल गई

    

              नुकीली चट्टानोंकी वही

अबूझ परम्परा;

फिर भी कैसे मुझे अजन्ता मिल गयी,

रंग लिये अवनीद्रनाथ के

यों महारथी की रेखाएं जी उठीं,---

लिये मीर के टाँके जैसे —

ग़ालिब के पैरहन,--ग़ज़ल कोई उठी,

लड़कपन में जो लूसी ग्रे

अचिन्ही खो गयी;

वही लौट, साकार सिहन्ता मिल गयी,

बदला स्वाद समय का, जैसे

चंडीगढ़ के भवनम नये माहौल में,--

रामकिंकर की मूर्ति-कला

मन में जो तोड़ती,--

कैसे वही अटूट श्रवन्ता मिलगयी,

नाटक हुआ स्वभाव कि जैसे

संसद में अभिनय हो पृथ्वीराज का,

फर्जी हुआ विरोध कि जैसे

जुगलबन्द गोदई-किशन महराज का,

उदय शंकर मशीन-नर्त्तन से

जिसे पुकारता;

वही वर्-चेतना नियन्ता मिलगयी,

4.--तभी मैं ,--तब भी तुम

पेड़ और पर्वत के नाम न थे,

सिन्धु और अम्बर के नाम न थे,

नाम न थे फूल  और रंगों के,

--तब भी मैं गन्धवती थी,

--तब भी तुम तेजोमय थे,

भाषा भंगिमा में अंकुरती थी,

निकटता परस से ही जुड़ती थी,

संगति तो संग-संग मुड़ती थी;

--तब भी मैं स्वप्नवती थी,

--तब भी तुम मेधावी थे,

श्रम कर, आश्रम के आश्रमिक हुए,

मूल्यों से भी परिचित तनिक हुए,

तर्के के गुणी सचमुच वणिक हुए,

--तब भी मैं रसवन्ती थी,

--तब भी तुम छलनामय थे,

5. ले लो जी अपना भाग

ले लो जी, अपना भाग,

कल ये

हाथ पराये होंगे,

आँगन की मिट्टी का मह-मह

चन्दन चुक जाएगा,

पिंजड़े में बैठ सुआपंखी

सरगम रुक जाएगा,

गौरया दर्पण-द्वारा न खटकयेगी;

लेलो जी, संचित राग,

कल ये

चषक जुठाये होंगे,

सडकों पर, बागों में धीरज के

पैर छिदे, ठहरे हैं,

अब भी तो समझो,---घाव

बांसुरी के कितने गहरे हैं,

यह तो बेगनबेलिया रोज बोलेगी,---

लेल जी , जुड़ती आग,

कल से

बिछुड़े साए होंगे,

लो, नानखटाई लो, शायद यों

फिर ना कभी सिंक पायें,

शर्बत में तिरते नयन चुमलो,

फिर न कभी दिखपायें,

बर्टी की गोली रोज छेद जाएगी’’’,

दे दो मंजरी- सुहाग,

कल से

कनु अनपाये होंगे.

          6. अर्थ मेरा क्या?

                        तनिक रुक जाओ,

समझ् लूँ—

अर्थ मेरा क्या ?

कुछ कबीरी बंदगी में,

ग़ज़ल-ठुमरी में,

फर्श-नावों पर लहरती

मस्त झिन्झरी में

सुलगते एकांत छान से

देह दुहरी में

---तनिक रम जाओ,

समझ लूँ—

अर्थ मेरा क्या ?

बन्द, नीली खिड़कियोंसे,

अगम गलियों से,

चित्र में भी तड़फाड़ती’’’

दो मछलियों से,

झील में डूबी हुई- सी

थिर पुतलियों से

---तनिक जुड़ जाओ,

समझ लूँ—

अर्थ मेरा क्या ?    

भटकते बहुरूपिये को,

थमे मौसम को,

रोज अनखाती किरण से

तुनुक शबनम को,

समय के अनगिन तटों से

बंटे संगम को

---तनिक अपनाओ,

समझ लूँ

अर्थ मेरा क्या ?    

गजर आधी रात का (1982,सहलेखन, नयी दिल्ली)

1.      जेल से उठ,

गाँव-घर तक

गूंजता फिर

गजर आधी रात का

पुनः बचपन के बथानों में

खूँदते मिट्टी मवेशी,

खींचते खूँटे,

लगे हुँकारने

चुप खड़े कुत्ते-स्यार

लगे आकनाने.

बूट, कुंदों, लाठियों की मार से चीखी चमरटोली,

देहरी से

सड़क तक फिर,

फिर गरजता

शेर वह फौलाद का.

फिर जवानी की हवाओं से

यों गरम पंखे हो रहे

जैसे कि चिनगी

बाँटती हो साँस;

शहरी कटा आकाश,

-नारों का धुआँ

कोर्ट, थाने, थैलियों के प्रेत को ललकारते झंडे;

शोर-गुल से

चुप्पियों तक

झूलता फिर

लौह पंजा बाज का.

बन्द या उढ़के किवाड़ों पर

दस्तकें हों या पुकारें,

भीतरी दहशत

न घर की टूटती;

-सिर्फ चिन्ता कूटती,

कैसे गुजारें?

गली, नुक्कड़, चौक से अब पक्षियो-सी लौटती आंधी;

पसलियों से

शस्त्र तक फिर

डोलता फण

लाल होते नाग का.

2.     सूख चले खेत

              सूख चले खेत सेंत-मेंत के,

उठ रहे बवंडर अब रेत के,

चलो, जरा नींद तोड़ देखें,

चुप्पी में भरा शोर देखें.

धनि-धनि खिलती – सी बस्ती

सुलग रही हँसी को तरसती,

वर्षा से हर्षाती हवा की

याद आज बिस्तर को डंसती.

उजड़ गया गमलों का बाग़ भी

बन्द हुआ टिटही का राग भी,

चलो बाँधकर अँजुरी देखें-

शोर में भरी चुप्पी देखें.

गहमागहमी यह शहराती

पाँवों से लिपट-लिपट जाती,

नींद और हँसी जो खरीदों,

-कीमत सुरसा बनती जाती.

रहने को तो गन्दी गली है,

खटने को ही सतमंजिली है,

चलो, बदलकर चश्मा देखें,

टुकड़ों में बंटा समां देखे .

गाँव और कस्बों से बहार

हथियारों के हैं सौदागर

यह अकाल, भूक और सूखा

बदले में लेंगे क्या खाकर ?

कहने को बाहर सनसनी है,

बन्द मगर अपनी चिटखनी है,

झूट के बहाने भर देखें,

छूटकर निशाने पर देखें .

3.      शुभ ललना

(धुन: बधावा)

दादी जगे पराती ले,

माँ हुलसे सँझवाती ले,

मुसके आठों पहर बहुरिया लड़कोरी,

-राम जिलाएँ भैया – भौजी की जोड़ों .

अरे, विरवा जीवे, शुभ ललना,

हाय, जिये जखीरा, शुभ ललना,

बीते कितने बरस, ण गिरती भीत उठी,

गुजरे कितने मास वगैर अंगोछे के ,

पखवारे कट गए बिना गेहूँ खाये;

हफ्ते खछुक हुए महाजन ओछे के ,

दिन गिन-गिन दाने जोड़े,

खेल – तमाशे सब छोड़े,

तब आई यह घडी देह के फलने की,

फिर जनमीं उम्मीदें समय बदलने की,

अजी, बढ़े बबुरवा, शुभ ललना ,

झरबेरिया  लहरे,  शुभ ललना ,

दादा पेरे गए ईख के कोल्हू में;

बापू पिसते रहे तेल की धानी में ,

बोरी ढ़ोते चचा, धनुहिया हुई कमर,

अपनी पसली हँसियाँ हुई जवानी में ,

लहू जलाकर त्यौरी पर,

कौड़ी पाकर ड्योढ़ी पर,

परती तोड़ी, -परत न सहते साइन की,

मौसम बदले, -शत्तीन बदली जीने की,

अहो, बधवा गरजे, शुभ ललना,

मुँह जोरवा बरज, शुभ ललना,

हँसे गुसाई छींट पसीना पुरखों का

छठी – दिठौना बांधे दीढ़ तिजोरी की,

बरही आते सरही बंधक से छूटे;

मुंडन होते बाँह कटे बरजोरी की,

कटे फसल करतारी पर,

झुग्गी चढ़े अंटारी पर,

कर्जी – फर्जी की हरबाजी मात रहे,

जलती लाल मलाल हजारों हाथ रहे,

अरे, तने झगडुआ, शुभ ललना,

अरे, लडे जुझरुआ, शुभ ललना,.

4.     सुर्खी लहठी-भरे हाथ

            (दीवाली-गीत)

सुर्खी लहठी-भरे हाथ ये

दिये जलाते हैं ,

उनसे सुबह न भेंट,

काम पर निकल गए जो;

शाम हुई, तब लेते आये जिनिस परब के;

खाने भी आये न, दोपहार भुगत चले जो ,

कैसे घर लीपा, फिर चौक पूरायह,

-वे क्या जानें ?

कबके बचे-जुगोये छुट्टे

तेल पुरते हैं,

पोत सफेदी अथक

कोठरी पर काजल की;

घर लौटे लेकर दो बच्चोंकी दो गंजी;

चढ़ा चटक सतरंग, क्रूर कोठी पर छल की,

कैसे मकई खिल-खांड में बदली,

वे क्या जानें ?

आँचल फाड़ बनाये बतिहर

जोत जगाते हैं ,

सेंतमेंत में मांग चार

कदली- थम गाड़े;

लछमी-मूरत नहीं, यहीं औजार टंगेंगे;

उड़ें पटाखे कहीं,-बजेंगे यहाँ नगाड़े,

उछल पेट की आग मशाल चढ़ेंगा,

-कब क्या जानें ?

लोग लुकाठी अभी भाँजते

या सुलगाते हैं,

  7. कूदे उछल कुदाल...

     (धुन: कीर्तन)

भैया, कूदे उछल कुदाल,

हँसियाँ बल खाये ,

भोर हुई, चिड़ियन संग जागे,

खैनी दाब, ढोर संग   लागे,

आँगन लीप, मेहरिया ठनकी,

दे न उधार बनियवां सनकी,

कारज-अरज जिमदार न  माने,

लाठियल अमला विरद बखाने.

भैया, तामे भूख किवाल,

तिरखा  कटखाये ,

“साँझ भई, नहिं आय मुरारी,”

-हाट बाट बहके न अनाड़ी,

तीन दीप : तिरलोक दिवाली,

पंजा-छाप :फाग की लाली,

फुटहा-गुड़:पकवान परोसे,

कोदो-भात रींध घर पोसे.

भैया, गुजरे दो-दो साल

कुर्ता   सिलवाये    ,

आज रात कम दुखे बिवाई,-

अब न बटेंगे खेत बंटाई,

फरे ‘नगीना,’-पिये पसेना,

बाढ़- सुखाड़ दैव,ना देना,

माथे मौर चढ़े बबुआ के,

बजे रसनचौकी झमका के,

भैया, लहके लाल मशाल,

कुहरा   फट जाए   ,

8.सीने से कान लगाये

(बटगँवनी)

रात भर सोये, रामा,

धरती की गोद में,-

सीने से कान लगाये,

जोर-शोरवाली  दुनिया  --  डूबचली   धीमे-धीमे

तस्वीरोंवाली  दुनियाँ – उभर माटी  के जी  में-

-कागज के टीले, उनपर

बैठे  लोभी   हरकारे,

दल  दल हाथ हजारों

हर टीले को ललकारें,

सोने का  शेर गरजे

टीलों की ओट में,

-बारूदी बू मंहकाये,

पैठचुकी जब हियरा में’’’’’धक्-धक् धरती के दिल की,

-गूँजती चली बट गंवली घर-घर खोयी मंजिल की,

-समय का समन्दर खारा

रचे आंसुओं से मोती,

यहाँ पसीने की नदियाँ

किश्तियाँ रतन की ढोतीं,

जल-डाकू  लूट लेते

घेरकर गिरोह में,---

माँझी भी लौट न पाये

सिंहासन से जुड़नाची चाँदी की चाँदनी भी

धरती बदली कारा में कैद हुई स्वामिनी भी

तीसरे पहर का पहरु-

बोलता मरम की बोली-

‘पहिल पहरमें दिवाली,

चौथे पहर में होली,”

संझा की लाली, रामा      

धनकेगी भोर में,--

जंगल पराती गाये,

     9. तुझ पर मैं वारी

     (धुन:परिछन)

घोड़ा-न-हाथी, लो आगये बराती—

बदल-से घेरे दुअरिया,

तुझ पर मैं वारी संवरिया रे दुलहा,

तुझ पर मैं वारी संवरिया,

घुटनों के नीचे है धोती गुलाबी,

माथे अंगोछा सजीला;

कुर्ता पुराना है लेकिन केसरिया,

जूता रबड़का रंगीला.

मुँह पर जो धानी रूमलवा रे दुलहा,

नजरें गिराये बिजुरिया,

फूटी न सीसो की गांठें, जो फूटी—

तेरी अनोखी जवानी;

तेरे पसीने से खेती जो लहरी,

--बरसा झमाझम पानी.

बजादिया तूने नगाड़ा रे दुलहा,

खूब ढोल पीटे नगरिया

घुरें जो पीछे से मालिक-महाजन,

--ढह जाय उनकी अटारी;

परिछे सुहागन की टोली झुमूकझूम

गैया हुमकती हमारी .

बछिया है दूबों की पाली रे दुलहा,

धीरे से धरना रसरिया

10.   छूटी दासता नहीं

(धुन:निरगुन)

ओ संगी,

साथ दे कहाँ तक

दुहरी होरही बहंगीया;

झुकती रीढ़ की धनुहिया;

बदला रास्ता नहीं,

कौन, जो बताये—किसने बोझ ये पराये,

दुखते कांध पर धरे ?

--साथ-साथ ढोये हमने; पुरखों पर रोये,

सबकी किंच में गड़े.

ओ संगी,

पालकी उठाओ---

आये दूर से कहरिया;

बदला वास्ता नहीं,

जोड़ीं उम्मीदों कितनी—तोड़-तोड़ नींदें—

रेती सींचते रहे,

बेचे मवेशी मेले, होकर परदेशी,--

ठेले खींचते रहे,

ओ हटवे,

पलदारी करते—

गुजरी हाँपती उमरिया,

कुचली बाँह की मछरिया;

छूटी दासता नहीं,

माटी से कढ़ती काया, माटी से जुड़ती,--

होगी फिर-फिर माटी,

आग ले बड़े जो, जुल्मी नाग से लडे जो,

-अगली वह परिपाटी,

ओ पंची,

बनिहारी करते

लकड़ी-सी जली जिनिगिया,

लड़ती राख से चिनिगिया;

---आँधी का पता नहीं.

राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रतिनिधि कविताएँ : ‘उजली कसौटी’ (1969,नेशननल पब्लिशिंग हाउस,दिल्ली)

आदमी धुएँ के हैं

ताँबे का आसमान,

टिन के सितारे,

गैसीला अन्धकार,

उड़ते हैं कसकुट के पंछी बेचारे,

लोहे की धरती पर

चाँदी की धारा

पीतल का सूरज है,

राँगे का भोला-सा चाँद बड़ा प्यारा,

सोने के सपनों की नौका है,

गन्धक का झोंका है,

आदमी धुएँ के हैं,

छाया ने रोका है,

हीरे की चाहत ने

कभी-कभी टोका है,

शीशे ने समझा

कि रेडियम का मौका है,

धूल ‘अनकल्चर्ड’ है,

इसीलिए बकती है-

- ‘ज़िन्दगी नहीं है यह- धोखा है, धोखा है !’

अवकाश

अवकाश...?

दूर होते जा रहे हम सब परस्पर

किन्तु रहते पास !

दौड़ते ही जा रहे सारी दिशाओं में

समय के अश्व पर अन्धे ;

- यही अभ्यास !

मैं भी और तुम भी और वे भी,

धन्य !!! क्या विश्वास ?

क्यों हो, किस तरह हो और कब

...अवकाश ?

हर खुशामद में ‘बड़ा पहुँचा हुआ-सा’ आदमी,

- हर ओर सत्ता के लिए बेआब,

लगता,-शिथिल, अन्धी गान्धारी को

भुजाभर बाँध लेने को शिखण्डी हो रहे बेताब

फिर भी...

चिमनियों से यह धुआँ, ये वायुयानी बोल,

पॉवर-हाउस के बेचैन फव्वारे उसाँसे धुन रहे;

ये अजगरी-सी योजनाएँ

और मेढ़क-सा नया ईमान;

खोद-खोद पहाड़, चूहे की मिली पहचान !

फ़िल्में ढाई घंटों की, काफ़े तीन घंटों का,

ड्यूटी सात घंटों की,-

क्लब में बॉल-फैन्सी डांस केवल पाँच घंटों का

मगर सच्चे दिलों की आरजू पर-

एक क्षण भी अब...नहीं...विश्वास !

क्या अवकाश...?

इतिहास-घड़ी

इतिहास की घड़ी में

सुबह के पाँच बज गए...,

घड़ी का एक काँटा तना,

- ध्रुव तारे के पाँव में चुभ गया,

दूसरा काँटा झुका,

- गर्भिणी धरती की नाभि में धँस गया,

ध्रुव तारा लंगड़ाता है,

धरती लहू न रुक पाता है,

ओ ऽऽ प्रधानमन्त्रियों ऽ !

क्या...तुम (?)

ऐसे ‘सर्जन’ हो,-

जो एक ही छन में औ’ एक ही छुरी से

पाँव के काँटे औ’ गर्भ के शिशु को

निकाल ले ??

क्या तुम ऐसे ‘सर्जन’ हो ???

सच बोलना

ओ चन्दन-वन के

मलयानिल !

सच बोलना,-

सोये थे

नाग सभी,

सहसा तुम

चले तभी ?

वर्ना क्या

शाखों के साथ अभी

तुम्हें भी पड़ता

किरणों में विष घोलना ?

- सच-सच बोलना !

सूर्य-रथ की धुरी

क्या ज़रूरी है-

कि रेगिस्तान ही हो

सूर्य का रथ देखने के लिए ?

क्या यही है शाप,-

रथ के बद्ध और अदृश्य-

घोड़े ही सदा दीखें......?

क्या शिकायत है किरण से सिर्फ़ इतनी,-

- क्यों न ठंडे लौह-युग में

दाह भरती है......?

क्या विनय है देवता से बस, यही-

‘आओ, गुनाहों की जमीं बे-मौत मरती है ?’

क्यों विवशता है-

कि अन्धे काल की ही

ग्रन्थियाँ खोलूँ,

या नदी की प्यास सीखूँ, टूटती परछाईयों से चाँद को तोलूँ ?

क्या मिलेगा-

यदि हिमालय मान लूँ

इस बर्फ़-कुल्फ़ी को ?

युधिष्ठिर से तेनजिङ् तक की विराट परम्परा को

चूसकर बोलूँ ?

अरे गुरु ! तुम रहे गुड़ ही,

कहीं गोबर न बनना भुरभुरी,

चीनी हुए चेले, कसौटी पर कसौटी है खड़ी !

उभरती पीढ़ियाँ ये-

भूमि के वश में करेंगी

सूर्य-रथ की धुरी !

सम क्या ? विषम क्या ?

हर ओर बजती ही रहेगी

सरचढ़ी, जादू-भरी

यह अभ्युदय की तुरी...!

उषा-स्वस्ति

प्यार की

दूरागता पहली पुजारिन-सी

आ रही नभ में उषा !

मौन संशय की अँधेरी छाँह

घिर पड़ी धुँधले क्षितिज पर,

-दूर नावों पर ;

अब उसे सस्मित समेटे जा रही

कल्पना की दिशा !

यही सुधिमय समर्पण की घड़ी,

छाया-जगत् को

यों चूमती अरुणिमा,

जैसे बरसती हो

उच्छ् वसित आसंग की माधुरी l

हां, चिरन्तन प्रीति की प्रतिबिम्ब गाथा-सी

तरंगित रंगिनी गंगा;

एक डुबकी ले सहज अभिषेक को

आ गयी जल में उषा !

ओ उषा !

ओ चेतना की माँ !

( ऐसी सन्निकटता के लिए करना क्षमा ),

रह रहा कैसे तुम्हारा रहस और अखंड यौवन,

दिप रहा सद्यस्क अंगों में भला कैसे-

आनन्द यह निस्संग ?

दे रही क्यों

जरठता को दान शैशव का ?

मैं मुसाफ़िर वंचना की रात का,

विश्वास भी अपमान !

लो, तभी यों हो गयी ओझल

स्वयं उजला अँधेरा ओढ़कर

यह मुँहजली मेरी तृषा !

ओ डूबती जल में उषा !

मुक्ति-क्षण

कुछ ऐसा खुलकर खुलना चाह रहा मन

इस क्षण

कि अँगूठी भी बन्धन लगती है;

लूँ इसे निकाल,

छिपा लूँ कहीं बगल में,-

इसलिए

कि सारे बन्धन छिपा-छिपाकर

आदमी सदा

अनुभूति जगाता रहता,

ज़िन्दगी कभी जिससे जीवित लगती है !

तो......

इस उन्मुक्त निमिष में

अंतर नहीं अमृत औ’ विष में,

जितनी मादक-

मुसकान मधुर लगती है,

उतनी मोहक-

पीड़ा लगती क्षण-दिशि में !

इस उन्मुक्त निमिष में-

मेघ-भरे दिन का धूमिल मुख

गीला-गीला,

रूखे-सूखे पेड़ों का रुख

पीला-पीला,

धूल-भरी भूली बेखौफ़ हवा के झोंके...

कौन विकल गाने की उमड़ती धुन को रोके-

“तुझे ओ बेवफ़ा, हम ज़िन्दगी का आसरा समझे,

बड़े नादान थे हम हाय ! समझे भी तो क्या समझे ?”

-बहुत भारी

भरे इस आसमाँ के

बहुत नीचे, बहुत हल्की हवा में-

उलझती साँस की घन जालियों से

कढ़ी आती हृदय में तान तीखी,-

किसी की धड़कनों के स्वप्न की

लपटों सरीखी,-

कहीं मानस-क्षितिज के पार की

अमराईयों से;

नहीं जो ठीक से अब तक कभी

इस पार दीखी !

बहुत निर्बंध होना चाहता मन,-

दिलाने को यकीं फिर से उसे गहराईयों का,

छिपाये है जिसे अब तक प्रतीक्षा का पठार

कि होगा तो कभी साकार खुद

विश्वास का आधार !

बन्धनों के पार थमना चाहता मन,...

आज, इस क्षण, आज खुलना चाहता मन !

विस्मृति के बोल

शिथिल,

विश्रृंखल,

बहुत बेसुध,

बड़ी बेहाल-सी

लगती नशीली चेतना बेलौस;

जैसे ज़िन्दगी के सब तनाव-कसाव,

पल-पल के दुराव-छिपाव सब

होकर सहज ढीले, बहुत-कुछ साफ़,

तन्द्रा की मदिर बेहोशियों में

खो रहे चुपचाप, अपने-आप l

मैं इस फैलती-सी,

...फैलकर हिलती, थिरक जमती

लचीली-सी सतह पर,

सिहरती अनजान लहरों में

सरकता जा रहा हूँ;

मैं उमड़कर खुद निखरता जा रहा हूँ ...?

एक भारी-सी, अजीब थकान

जिसका अन्दरूनी भार शायद

देह की हर पोर से बंध झूलता है,

-नींद की चादर उढ़ाता है शिथिल-सी बेबसी पर,

ऊँघकर सर झुका लेतीं प्रखर लपटें,

एक जादुई धुआँ बन मिट रही सुधि राह की l

किन्तु इस अवसाद की

रंगीन, गैसीली घड़ी में, कसी ढीली कड़ी में-

यों जग रही है मौन की नगरी

किसी भटकी परी-सी बोलती है-

“ कौन छाया,...कौन है, जो

द्वार सारे खोलती है ?

वह लिये जाती अनोखे मंत्र-बल से

समर्पण के बुदबुदों पर मुझे बिछलाती,

झुकाती हर किसी के लिए, हरती जटिलताएँ,

गुत्थियों की हर नई चट्टान को पिघला रही ?

कौन छाया, कौन है; जो

आग मधु में घोलती है ?”

श्याम छाया से अनाहत श्वेत छाया बोलती है-

“बस, अभी चुपचाप झुकने दो,

मुझे अब टूट गिरने दो अगन्ध गुलाब-सी,

अब तोड़कर तट आप ही निर्बन्ध बहने दो-

अघात सैलाब-सी !”

...तो घूमता ही रहूँ कोई अजनबी या

सवारी के साथ;

शायद युगों का खोया हुआ परिचय मिले,

सुबह से आधी निशा तक का अशेष अभाव

जब तक अलस आँखों में न सिमटे,

घूमता ही रहूँ जब तक सर न घूमे !

अभी जब सोया ज़माना,

हर किसी की खो रही खुद में कहानी,

लुढ़कती जातीं उसाँसों की लसीली गोलियाँ,

है ‘स्लोप’-सा हर भाव का स्वर;

-तभी है रेडियम के तार से उलझी

चली आतीं किसी की सुमुख-रेखाएँ,-

उजलती आ रहीं,

मेरी चमकती चेतना की रात जुगनूदार

ढलती जा रही,

मौन, ढुलती, मूक विस्मृति को

मदीली नींद छलती जा रही l

मेरी चमकती चेतना की

रात जुगनूदार ढलती जा रही l

ऊष्मा

सुरभित रस में डूब रहे हम

फिर भी प्यास वही,

रहते उच्छ्वास वही,

धड़कन से धड़कन मिल जाने पर भी !

चारों ओर भरी है

यह गुलाब-जल-भींगी उमस,

युवा किरणों के नर्त्तन, उष्ण वायु के कम्पन,

शिखरों के आकाशी चुम्बन से

दहकी-दहकी है आग मही की,-

मेरे और तुम्हारे जी की l

सुबह-सुबह के स्निग्ध नहाये--

अंग तुम्हारे ओस-धुले दूर्वा-दल से,

यह ‘स्नो’ का मंद सुवास,

‘पाउडर’ की रूप-श्री,

नव ‘सिल्कन’ परिधान,

सरल श्रृंगार,

भोर भर रही लहू में नई रवानी,

श्रम से भरी जवानी !

बढ़ती धूप

काम में सधे हुए तन-मन,

प्रकाश के साथ चार लोचन हो उठते प्रखर

और रिसता रहता जीवन l

वे जीवन-स्वप्न हो चले आँखों से ओझल-

जिनमें झलमल मेखला-दुकूल-अलंकृत

होते थे नितम्ब-उपधान,

चन्दन-हार-सुशोभित पीन उरोजों का

शीतल आलिंगन

और अगरु-वासित अलकों की गन्ध कभी

थी ताप-शमन-संजीवन !

अब तो-

...गाँव-गाँव में खाद पसीने की

हलवाहे बहा रहे खेतों में,

...फूलें अमलतास या रक्त पलास नहीं,

थम जातीं कहीं घरेलू नारियाँ,-- सामान संभाले

सरकाये आँचल वर्रातीं हाट-बाट में छाँह तले,

अब अंग-सन्धि के स्वेद-कणों से सिक्त

रेशमी वस्त्र कहाँ लिपटे हैं

उनकी खाली बाँहों में ?

...जामुन के नीचे, बसबाड़ी में

बोझ घास का डाल,

किशोरी सीख रही  कूक,

फूँक देता सुदूर बाँसुरी नहीं मन चाहा चरवाहा,

गा देता किसी फिल्म का गीत l

...मिली छुट्टी कामों से एक घड़ी,

तो नज़र पड़ी तलफे मवेशियों पर किसान की;

हरा-हरा पानी गड्ढे का पिला उन्हें

खूंटों से बाँध दिया कि ज़िन्दगी ही गोबर हो पड़ी !

अब तो--

शहर-शहर में...

फूल उठे गुलमुहर,

‘पार्क’ भी गुलदस्ते-सा

कुम्हलाता गर्मी में,

सडकें पिघल रहीं,

‘बस’ और ‘ट्रेन’ में घुटन,

तोष खस की टट्टी में

बंद पड़ी दूकानों के नीचे उलझी हैं

पनिहारिनें पचीसों,

नल खुलने के इंतज़ार में--

घड़े पड़े चालीसों l

पार कान के हुई किसी ट्रक की आवाज़

सलाख-सी,

जितनी बर्फ़ पियें उतनी

उड़ रही गले में राख-सी l

धीरे-धीरे साँझ हो रही,

तुम बरामदे में चुप करतीं

इंतज़ार मेरा,

भरी-भरी पलकें ये दुपहरिया में लग न सकीं,

जिनके आगे से

निकल गई होंगी कितनी बग्घियाँ, मोटरें,

रिक्शों की पाँतें कतरातीं,

जिनमें निष्फल उतराती होंगी फिर शायद

दूर किसी जंगल-पहाड़ की,

दूर मसूरी या शिमले की वही कल्पनाएँ, चाहें,-

जो बहुत पुरानीं l

कहाँ झलक पायें आँखों में

वन-पशु, पंछी, सर्प-मयूर, सिंह-करिवर,

मेढ़क-मछली, सारस-बन्दर,- सब दाह-विकल,

वे कहाँ झलक पाये ?

मैं थरमस में आइसक्रीम लेकर आया

तौ हँसी आ गई,

मध्यवर्ग के घर में कोने-कोने तक

बरसात छा गई !

आइसक्रीम पर होठों की मीठी स्केटिंग,

-- वा ऽऽ ह !

ठंडे होठों के गरमीले चुम्बन में

सिहरी-सिहरी-सी शाम !

फिल्म देख लें, आज एक सौ अस्सी पैसों की

दो खुशियाँ साथ लूट लें !

अभी, रात को लौट दस बजे,

खा-पी, लेट गए छत पर,..

-- क्यों ऊब उठे हम ?

हवा चल पड़ी, जैसे टूट गए बन्धन !

तुमने गाया—

“दम भर जो उधर मुँह फेरे

ओ चन्दा ऽऽ !

मैं उनसे प्यार कर लूँगी,

नज़रें तो चार कर लूँगी !”

मैं सोच रहा:

नज़रों की भी चाँदनी अनोखी है,

मन की इस ऊब-उमस पर

चन्दन बरसाती है,

चन्दा मुखड़े का भी कितना प्यारा,

अंगों में, मुरछी-मरी उमंगों में

ऊष्मा भरता है,

ये रोज जिलाते हैं जिजीविषा को,

सुनती हो ?—सचमुच रजनी भर

निहारता हुआ तुम्हारा मुख,

चन्दा भी अमृत-कणों की कमी

रोज पूरी करता है !

उजली कसौटी

जब भी इस जीवन को

मुड़कर मैंने देखा,

दीख पड़ी गंगा यह

उजली कसौटी-सी,

काश ! जान पाता मैं-

क्या तुमने भी देखा ?

अच्छा है,- जान सकूँ नहीं,

नहीं तो अपने-आपको

या तुम्हें भूल जाऊँगा !

- हम हैं दो बिन्दु,

हम विसर्जित हैं,

जीवित, असमर्पित है केवल यह याद की लकीर

उजली कसौटी पर

या...द...की...ल...की...र...नीरंग है,-

यह गति की वेग-धार अ...न्त...ही...न,-

यही नापने में तो मेरी हर लहर

विफल हो गई !

काश ! जान पाता मैं-

क्या तुमने भी नापी ?

इसके अतिरिक्त अभी तक मैंने खींची हैं

उजली कसौटी पर काली रेखाएँ,

इसीलिए टिकीं नहीं,

घुलकर सब बिला गईं;

अब जो गुज़रता हूँ कभी स्टीमर से,

लगता है-

उजली कसौटी पर चाकू फेर रहा हूँ !

- काली रेखाएँ

मानस में उग आती हैं,

कोई अर्थ-भरी तसवीर

नहीं बनती,

सब खिंचती, कट जाती हैं

काश ! जान पाता मैं-

क्या तुमने भी खींची ?

गंगा,- यह उजली कसौटी तो

मेरे लिए रहेगी,-

मेरे जीवन की हर धातु जो साँवली है !

उसे तपा हुआ सोना समझ लेता हूँ !

खींचता लकीरें सुनहली

पर काली उग आती हैं;

तो मुझे यकीन है,- कसौटी ही उजली है !

काश जान पाता मैं-

क्या ऐसा तुम्हें भी यकीन है ?

गंगा तो मेरी कसौटी, हाँ, वही ,मुक्त प्रगति की चुनौती,

तो,... मैंने या तुमने –

जिस साँझ को निहारा,

जिस चाँद को पुकारा,

जिन मेघों को सारा,

जिन तारों को आँसू से

जीत-जीत हारा;

उन सबकी पथ-रेखाएँ जिस पर खरी उतरीं,

काश ! जान पाता मैं,-

क्या वही तुम्हारी भी

–उजली कसौटी है ?

तसवीर का मौन

उस मौन को

मेरे विनीत प्रणाम है !

– जो बार-बार

अपार सागर-सा प्रकट हो

घेर लेता

चेतना की नाव को-

अपने निगूढ़, अमेय ताल में

खींचकर,

टिकने न देता

एक पल,

कर बुदबुदों से विकल,

देता छोड़ छिन्न बहाव को !

वह मौन –

मेरी दृष्टि में चिर प्यास है !

– तसवीर में अनबोल छाँह-प्रकाश,

इन अंकित पड़े नीरंग होठों पर

–तलफते चुम्बनों में घुट रहा मधुमास,

-तेरे चित्र का उच्छ्वास,

-वह मौन मेरे मौन का इतिहास है !

मैं स्वर न देना चाहता हूँ उसे,

डर है,- बाख रहे रस-बिंदु जो

वे भी न छिन जाएँ

लपट के लोक में !

उस मौन को

मेरे विनीत प्रणाम है !

यह रच रहा हूँ

शब्द, लय, झंकार जो;

तो इसलिए केवल

कि ये व्यवधान हैं;

हटा दूँ क़ायदे से इन्हें,

विनिमय हो परस्पर मौन का

प्रश्न का भावी

वही मुसकान,

जो बचपन की भोर में खिली

अनजान, सपनीली कली-सी, होठों पर,

-हजारों बार यों ही आ गई, बिलमी,

सकुचकर चल पड़ी

भटके हुए मेहमान-सी;

पर वह नया आरम्भ बन जाती बराबर

कौन-सी इति के लिए ?

वही सपने छली,

जो नौ बजे दिन में चपल कैशोर के,

मुक्त नयनों में उठे

बन कल्पना के ज्वार

और यौवन को डुबोकर

लाखरंगी फेन में, छहर लौटे,

-दोपहर तक खो गए !

स्वप्न दिन के घिर पड़े

बन मौन मृग-जल,

उम्र सैकत में तड़पती ही गुज़रती है

न जाने किन बदलियों के लिए ?

पिपासा भी वही,

जो डाह की अनुभूति पीती रही,

अन्तर्हवन की ज्वाल-सी जलती रही,

जो साध की आहुति बना संभावना को,

विफलता की छाँह में पलती रही !

अब ढल रही दोपहर,

प्यास की लपटें धुएँ से हो रहीं कातर,

-बदलती जा रही है रंग;

क्या सलोनी साँझ तक

होकर धुईंली और काली

बन चलेंगी वे तिमिर की चित्र-लपटें ?

बुझ न पायेगा कभी वह

अनुस्यूत प्रदाह !

प्यास, -चुपके पी गई जो कभी

शबनम का समंदर,

सोख ली जिसने

अनाविल अश्रु की गंगा,

वही मन्दाकिनी को भी बनाकर भाप,

शायद निगल जाएगी !

यह अघाती ही नहीं

किस विरल निर्झर के लिए ?

वही मुसकान : भटका अतिथि,

वे सपने छली : अभिशाप,

इति क्या ? ...बदलियाँ वे कौन ? –कैसा विरल निर्झर ?

प्रश्न का होता नहीं उत्तर,

हमारे अनुभवों में कभी मिट जाता विवर्त्त-विधान,

सारे प्रश्न हो जाते तिरोहित,

उत्तरित – सबके लिए !

अलविदाएँ

आँखें भर निहार लूँ

हरे-भरे पहाड़ों को,

ये मेरे शैशव के कल्पना-निलय हैं;

अब तक जिनके न द्वार खुले, बंद वातायन रहे पहेली – जैसे,

उन्हें टूट हारती उसाँसों से

अलविदा !

बाँहें भर भेंट लूँ

तरंगाकुल नदियों से,

ये सब मेरे ही कैशोर की पुकारें हैं;

जिनका उत्तर न कभी गूँजा है,-

उन्हें भी अधीर संकेतों से

अलविदा !

गले-गले मिल लूँ

इन बादियों की हवा से,

यह मेरे यौवन के सपनों की रखवालिन,

समतल ने जिसका

कभी मोल नहीं आँका,-

उसे धडकनों से अभाव-भरी

अलविदा !

भाव भर सहेज लूँ

अजाने बन फूलों को,

ये शायद मेरे भविष्य के गवाह हों,

जिन्हें हार बनने की वांछा कभी नहीं,-

उन्हें हेरती कृतज्ञ आँखों से

अलविदा !

प्राणों में समेट लूँ

अछूती नीलिमा को ही,

यही तो मेरी सार्थकता की चुनौती है,

सिमट-सिमट आती जो

शिखरों की बाँहों में,

फैल-फैल जाती जो

समतल की राहों में,

लहरों की छाँहों में,-

उसे साथ लेकर आसंगियों को

अलविदा !

दो ध्रुवों के बीच

दो अपरिचित भी नहीं,

हैं सिर्फ़ दो अजनबी, अनजाने-

रहे अज्ञात क्षण से असम्बद्ध किसी निमिष तक

किन्तु अपरस्पर नहीं कोई कहीं जीता :

बंधे इतिहास से हैं स्थान

से हैं बंधी संख्याएँ

सदा बाँधे प्रकार

बाँधे रूप

बाँधे नाम l

गुण में l

गुण-परस्पर, सुसम्बद्ध, विश्रुत, अभिन्न, अटूट l

तो शायद किसी का अपरिचित रहना असम्भव है l

तभी हम अपरिचय का उभयनिष्ठ समय व्यतीत किये,

हुए परिचित गुणों से, नाम से, रूचि से,

अमित सम्भावनाओं से, प्रयासक स्वप्न से !

हम परस्परता प्राप्त कर भी रह गए हैं

दो ध्रुवों पर, भिन्न - !

जो कुछ है विदित या बाहरी अभिव्यक्ति,

उससे मौन अन्तस् का न मिलता बिम्ब;

यों हम दो ध्रुवों के बीच उलझी प्रक्रिया की

व्याख्या में जी रहे या मर रहे –

अनुमान के अनुमान के – अनुमान – के अनुमान के –

अनुमान को l

राजेन्द्र प्रसाद सिंह की कविताएँ : ‘डायरी के जन्म-दिन’(1973, अनुपम प्रकाशन, पटना )

1.            दो फूल मिले...,

- हवा के झोंकों से नहीं,

अपने हरे-नीले रस ले

वि  क  म्पि  त...,

दो डालें डालों से उलझीं,

- बवंडर में नहीं,

अपनी गाँठों के उलझे-से

दर्द में डो  ल  ती;

अभी दो पेड़...

अपनी जड़ों से नहीं उखड़े;

तुम्हें क्या तकलीफ़ हुई,

ओऽ...बिजली !

निर्मूला, ...अपुष्पा, ...निश्शाखा,

- यों टूटीं तुम कि दोनों को डाह गईं !!!

[१९६७]

2.        स्वप्न...

कच्ची नींद का पाहुन,

बेवफ़ा है,

- दीठ से...भागे

पीठ-पीछे कोसने को

बंद पलकों में

सदा जागे,

एक खुशबू से बदल दे राह,

एक धूप न जी सके

जिसकी रतीली चाह,

जोड़ ले कड़ियाँ संझाती

शिखाओं की,

- छोड़ दे घड़ियाँ रुलाती

उषाओं की,

स्वप्न...

टूटी बीन की धड़कन,

दोरुख़ा है !

[१९६६]

3.        एक जीवन

है किरण का सिन्धु-कर्षण,

एक जीवन

है धुआँ की रेख का विस्तार......!

स्वप्नवर्ती गीत में या

मथी-सी नीहारिका में या

असह्य सुगन्ध के अभिशाप से

मुरछी, झुकी चम्पा-कली की

पीतिमा में......क्या भरा?

उफ!

समय का दर्द

कितने प्रश्न-चिह्नों में बँटा है !

देख लो -

वैदूर्य मणि कोई जड़ी है

मृत्तिका के पात्र में जिसके लिए,-

वह अनागत......सदा प्रस्तुत है;

नहीं खुलता यों कभी वह

अकिंचनता का मुखौटा खोल !

फिर भी जानता है निखिल सागर,

जानता है,- वीचि, उर्मि, तरंग में,

अनथके ज्वारों में

सदा पद-चिन्ह उतराते रहेंगे;

अंत-हीन, अमेय नीलाकाश भी

पहचानता है,-निज विकुंचन में,-

अथिर होंगे न पर्वत शिथिल

छाती पीटने से;

-इंद्र हो या वरुण,-

सारे पर्वतों के पंख लौटा दे,

फिर भी वे न डोलेंगे,- न बोलेंगे,......

एक जीवन

है तिमिर की धड़कनों में गूँजता स्वीकार !

[१९६५]

4.        देखकर फिर ग़ैर को

अपने लिए कुछ जगा,

जैसे प्यार कोई ठूँठ......

जो आदि से चल अन्त तक आया नहीं;

मन बधा चुप्पी से, रहेगा लौटता...!

कल्पना के

शिखर से उतरी अपर धारा,

त्वरा से दौड़ती

कोई स्वचालित उ...ष्मा...

देखता हूं,- पथ नहीं

गन्तव्य का सहचर,

न होगा अस्तु

कोई अनलिखा आदेश;

छन्द है हिमसार-शीतल बन्ध,

वस्तु-व्यापी कौन हो ?

अग्रिम क्षमा की नियति क्या ?

मेरी सुकैशी हँस रही,-

नयनाभिराम प्रगामिनी...

नि शेष द्रुत संगीत कोई- मूक,

रेखांकन नहीं होगा – प्रवर्त्तन का,

जिजीविष के लिए निरपेक्ष ही,

विश्रब्ध ही,

जीना-जिलाना

मार्ग;

यही है सृष्टि,......बड़ी महार्घ !

[१९६३]

5.        एक नीरव स्वप्न,-

जैसे प्यार का

कोई समुद्गम ही नहीं,

बस...चेतना है,-

त्यक्त भावों की विरासत-सी;

नग्न केवल

और सुस्थिर विश्व

[ मद की ‘साधनाओं’ के किनारे मौन ] !

कौन है ?... कौन है, जो

प्रश्न की अमराइयों में

आज जीवन-वर्तिका को

स्नेह दे ?

ओ ऽ ऽ अंशुमाली...!

हो चुकी पूर्वार्द्ध की सन्ध्या

असुंदर शिलाओं पर

वृन्त-छूटी कली-सी निष्प्राण;

आहत हैं

किन्हीं युद्धागतों की

पंक्ति में

मेरे अपूजित प्राण के प्रतिमान !

नश्वर और दिव्य

अतीत के

आवाहनों से मंत्र-पूता अग्नि की

वे अर्चियाँ अब

रह गईं अव्यक्त...

क्षीण है

गन्तव्य की पथ-रेख,

पूर्वापर अमिट आराधनों का

शेष है- सन्दर्भ;

मैं इस तरह, कब...तक

विश्व-हीन, अकम्प, केवल शून्य

होकर

चाहता निर्वाण ?

यह अति है,

अनाश्रित ज्वार की अति है; सुनो ऽऽ...

आवर्जनाओं की त्वरा के देश !

जो कुछ है वही केवल नहीं

संभाव्य का आधार,

सब कुछ है, रहेगा,

हो रहा है,- यह करो स्वीकार !

[१९६२]

6.        अन्त का हो क्या पता,

जब साँझ की

अंतिम किरण भी

पिंगला आभा सँजोये

ठिठक जाती है,-

किसी सज्ञान

मुंदते कमल के संकेत पर;

आशा पुनः आरम्भ की मिटती

नहीं...

यह एक सघन यथार्थ है

नीरव सितारों के लिए,

जो देखते शायद

किसी पूर्वाग्रही की निराशाओं को पसारे-

गृद्ध विष-भोजी

तिमिर के नाम से

चुप आ रहा......

यह गृद्ध विष भोजी

हमारा

सहज मिथ्या-बोध है,

[ तिमिर कुछ भी नहीं,

जो कुछ है,-अनीह प्रकाश ! ]

फिर भी

यह मिथ्या-बोध

सघन यथार्थ है

नीरव सितारों के लिए;

जो निराशा के पूर्वज हैं,

- वंश आशा का हमेशा विलग है उनसे...

चाँद आएगा,

तटस्थ सुहास का जल

बाँट जाएगा,

अभी निकले अंडजों को

दूँ बधाई

जिन्हें पीने को

तृषित अजगर बढ़ाथा...

चाँद आएगा,

सलिल दुलार का फल

बाँट जाएगा,

गृद्ध विष-भोजी

अनामत भोर में

चुप लौट जाएगा !

[१९६१]

7.        यहीं,- गहरे सन्नाटे में,- यहीं

सिर्फ इसलिए कि यहीं आसानी है

ध्यान देने की, उस गूंज पर, जो

सारी पहचानी आवाजों की पृष्ठभूमि में

और इसीलिए उनके बगैर भी

निरंतर बजती रहती है;

जिसके आधार नहीं रहने से

कोई आवाज़ नहीं गूँजेगी;

यहीं, अनाहत के आहत होने पर भी,

अनहद की हदें जोड़ने पर भी

सुनेंगे हम,- प्रक्रिया की गूंज,-

अपनी धमनियों में,- यहीं

जुड़े हुए सीनों के गहरे सन्नाटे में, यहीं !

[१९५९]

8.        ज़िन्दगी का एक दिन भी

सहनशील विकास के

इतिहास से कम नहीं !

एक क्षण भी तो

नहीं एकांत !

बिंदु सारे

बन चुके हैं केंद्र;

कट रहीं

केवल परिधियाँ

दिशा-हीन

अशांत.........!

[१९५०]

9.        सभी कुछ सोचकर भी हम

न कर पाते अमिट विश्वास

कल के अनुभवों पर,

क्योंकि कल के

मौन अनुभव

आज की ही मुखर इच्छा के

सँजोए अंश होकर

जी रहे हैं,- जी सकेंगे !

अंश के प्रति

आदमी को मोह,

पूर्णतर के प्रति अजब विश्वास;

काल क्या है?-

अप्रस्तुत-सी पूर्णता का

‘आज’ में आभास !

[१९४९]

10.      नवीन बीन के सुवर्ण-तार, तार बोलते !

निशा ढली, जगी-उगी नई उषा सुहागिनी,

अतीत-गीत खो गये, मिली नवीन रागिनी,

भरे प्रसून-राशि डाल-डाल में विनम्रता,

स्वदेश के मुकुट-किरीट पर उगी स्वतंत्रता !

मृदुल मलय-समीर-ताल रश्मि-द्वार खोलते !

नयी उठान सिन्धु की मचल रही कग़ार पर,

कठोर शैल-खंड तोड़ती हुई पखार कर,

पहाड़ पर चढ़े लहर-लहर सुधा-समुद्र की,

शमित हुई झिपे-मुंदे प्रदीप्त आँख रूद्र की !

शिखर-शिखर पुलक-सिहर निहार ज्वार डोलते !

विजय हुई, मुखर क्षितिज हुए सुगीत बाँचते,

शरीर की खुशी यही मगर न प्राण नाचते,

समष्टि का प्रमोद देह का विनोद ही बना,

समग्र सुख समाज का हृदय-पयोधि से छना !

सभी यही कुभोग ढूंढते, प्रताप तोलते !

प्रतिध्वनित हुआ अनन्त व्योम शंख-नाद से,

खुले नहीं श्रवण विमूक अश्रु के विषाद से,

बनावटी बनी मनुष्य की वियुक्त ज़िंदगी,

हँसी दिखावटी, अशेष एक आग-सी लगी !

अतृप्ति पत्र में अमंद  तृप्ति हम टटोलते !

उठो, अगेय गीतिमय ! नवीन दिग्चरण धरो,

नवीन भाव-राशि नवीन काल-क्षण करो,

सुवर्ण तार से प्रकाश-गान गूँजते रहें,

अगम्य चित्र-बीच सन्धि-बिन्दु सूझते रहें !

चलें अनेक रंग-बीच एक गन्ध घोलते !                                                          

[१९४८]

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