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  नवगीतों के उत्स में निराला                                                      नवगीतों के उत्स में निराला                                                                                       भोलानाथ




भोलानाथ

निराला का आभिर्भाव भारतीय साहित्य-संसार का बसंतोत्सव है !अपने अनुभव और सामर्थ्य से जो भी और जैसा भी जितना भी साहित्य को टटोल और खंगाल पाया हूँ !नवगीत के फूटते हुए उत्स देख और समझ पाया हूँ !निराला जिनमे नवगीत का प्रथम उत्स फूटता हुआ दिखाई देता है संक्षिप्त परिचय नवगीत की गंगोत्री का आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ इस आशा और विस्वास के साथ की सुनी सुनाई भ्रांतियां के बहार निकल कर हम नवगीत की शक्ति और सामर्थ्य को समझ सकें ! विस्मार्क की लौह और रक्त की कूटनीति सेविषाक्त हुए विश्व में उन्नीसवीं शताब्दी जब दम तोड़ रही थी ,निराला का जन्म शताब्दी के अंतिम बसंत में २१फ़रवरी १८९९ के दिन बंगाल के मिदनापुर जिले की महिषादल रियासत में हुआ !निराला गढ़ाकोला का दैन्य और करुना ,महिषादल की सघन हरीत्मा ,बैस्वाडे का ठेठ पौरुष,वैदिक परम्परा पांडित्य लेकर अवतरित हुए ! वे आजीवन शोषण दुरव्यवस्था के अंधमहासगर मथते रहे, विष पीते रहे और अमृत बांटे रहे !निराला के जितने रंग हैं,उनके न रहने पर साहित्यिक बनियों ने उन रंगों से व्यापारिक मेले सजाये और अपने घर भरे,पर निराला के मन में बसे दीन- हीन मनुष्य के भाल का मंगल अभिषेक न हुआ !पुरुषोत्तम दास टंडन और रामचंद्र शुक्ल की उपस्थिति में साहित्य सम्मलेन में पीटने वाला निराला ,जिस भारतीय और भारतीय मनुष्य के गौरव के लिए लड़ता रहा, आज भी वह उतना ही बंधुआ है,उतना ही गिरवी,और उतना ही पराधीन है ! निराला के सामने जितने भी रस्ते थे,वे सब इतने संकीर्ण थे की उनके महाप्राण न तो उन्हें स्वीकार कर सकते थे,न तो उनमें उनका विराट व्यक्तित्व समा सकता था ! तो निराला के कवी को जीवन भर चट्टाने कटनी पड़ीं और पीठ पर नदी ढोनी पड़ी ! बस इसी संघर्ष और श्रजन के बीच अमृत का जो ज्योतिर्मय निर्झर,हजारों सालों से कुचले गए सामान्यजन के चुल्लू तक पहुँच पता है !उसे ही हम नवगीत की संज्ञा देकर निराला और निराला के बाद की छान्दसिक कविता को पंडों और प्रदुषण से मुक्त रखने की च्येष्ठ में जुटे हुए हैं ! निराला के श्रजन में उनके संघर्ष और उनके संघर्ष में इस सृजन को देखे बिना,न तो नवगीत के प्रथम उत्स के रहस्य को समझा जा सकता है और न ही निराला के व्यक्तित्व और कृतित्व की व्याख्या की जा सकती है !पारम्परिक काव्य और कविता की राजनीती से कविता की विशुद्ध धरा को फोड़ कर निकलने में जहाँ चट्टानें कटीं वहीँ नवगीत का जनम हुआ और जहाँ छेनियाँ टूटीं वहां कविता छंधीन होकर रह गई ! बाद में इसी छंधीन कविता को कविता के बनियों ने नई कविता की संज्ञा देकर बेंचना – भांजना शुरू कर दिया ! फिर तो बाकायदा इसका उत्पादन भी प्रारंभ हो गया !सस्ती चीजें जल्दी बनती हैं और जल्दी बिकती हैं !लोकप्रियता अर्जित करने के के सूत्र खोज निकाले गएऔर इस तरह नई कविता और पारंपरिक सस्ते गीतों के नियोग से अक अलग ही प्रकार की कविता का जन्म हुआ !जिसे आजकल मंच की कविता के नाम से ख़रीदा और बेचा जाता है!कौन कला,परिश्रम और समय के संकट में पड़े !लोग तो आनन् फानन रहीस बनाना चाहते हैं! कविता के रहीसों में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है ! निराला के सामने दोहरी कठिनाइयाँ थीं ! अक तो उन्हें निरंतर प्रयोग से गुजरना था दोसरे तमाम तरह के घटिया लोगों के सामने अपनी प्रमाणिकता को बनाये रखना था !यही करण है की प्रयोग के तहत उनहोंने कभी छंद को छोड़ा और कभी छंदों के अभिनव प्रयोग किये !उन्हें निरंतर इन दोनों ही प्रकार की कविताओं की प्रमाणिकता के जिस तत्कालीन मठाधीशों से जूझना पड़ा !महावीर प्रसाद दूवेदी ने गढ़ाकोला से दौलतपुर तक निराला के ढोये आम तो खा लिए उनकी कविताएँ छपने से परहेज ही करते रहे !रामचंद्र शुक्ल से तो उनकी बराबर ठनी रही !रामचंद्र शुक्ल पर निरालाजी की लिखी हुई कविता का यह अंश,उनकी विनोद प्रियता, विरोधिओं को आड़े हांथों लेने को सदा तत्पर रहना तथा कलात्मक अभिव्यक्ति को प्रतिकूल समय में भी बनाये रखने की अदभुतक्षमता का परिचायक है ! - जब से एफ.ए.फेल हुआ, - हमारा कालेज का बचुआ ! - हिंदी का लिक्खाड़ बड़ा वह . - जब देखो तब ऐडा पड़ा वह, - छायावाद रहस्यवाद के - भावों का बटुआ ! आरोप की भाषा में अक बात कही जाती है की, लोग अपनी विधा को निराला से जोड़कर महान बन्ने में जुटे हुए हैं ! यह दंभी मनुष्यों की अधकचरी मानसिकता प्रलाप है ! ऐसे लोग न तो निराला को और न ही परवर्ती नवगीतकारों को समझना चाहते !ये लोग तो साहित्य की दलाली करने में सर्वस्य देखते हैं !आज की वामपंथी एवम् दक्षिण पंथी साहित्यिक संस्थाएं ऐसे ही दलालों की गिरोह बनकर रह गेन हैं !ये संस्थाएं पुरोधा कवियों का यश उड़कर बड़ी बनी हैं ! जबकि आज का नवगीतकार भारतीय कविता को आधुनिक संस्कार देने में साधना रत है ! किसी तरह के वाद से मुक्त,राजनैतिक प्रपंच से दूर रहकर छान्दसिक अभिव्यक्ति को नए क्षितिज देने में वह इतना मुग्ध एवम्मस्त है की प्रतिस्पर्धा की घटिया दौड़ में सम्मलित होने का न तो उसके पास समय है और न ही मानसिकता ! स्वयं निराला वादों के संक्रामक रोगों से कितने मुक्त थे,उनकी मास्को डायलाग्स शीर्षक कविता से यह बात समझी जा सकती है ! फिर कहा, मेरे समाज में बड़े बड़े आदमी हैं, एक से एक मुर्ख,उनको फ़साना है ! XXX XXX XXX XXX XXX उपन्यास लिखा है,जरा देख दीजिये अगर कहीं छप जाय तो प्रभाव पद जाय उल्लू के पट्ठों पर ! XXX XXX XXX XXX देखा उपन्यास मैंने श्री गणेश में मिला पृय अस्नेह्मयी स्यामा मुझे प्रेम है , इसको फिर रख दिया, देखा, मास्को डायेलाग्स देखा गिडवानी को ! निराला का जो अनुभव संसार था उसे चित्रित करने के लिए,उनके पास समय भी तो न था !उसे किसी भी तरह व्यक्त कर देने की गरज से निराला को कभी छंदों से नीचे भी उतरना पड़ा ! यह निराला के लिए निहायत जरुरी था ! किन्तु अपनी रचनात्मक समाधि के क्षणों में उन्होंने जो भी रचा,वे भारतीय कविता के अद्धितीयनमूने हैं !छंद निबद्ध ऐसी ही कविताओं को हम हिंदी के सबसे पहले नवगीत कहते हैं ! बानगी …… नव गति,नव लय,ताल छंद नव नव नभ के नव विहगवृन्द को नव पर नव स्वर दे ! वीणा वादिनी वर दे ! ये पंक्तियाँ नव्यता के प्रति निराला की उत्कट ललक को व्यक्त करती हैं !वीणा वादिनी माँ सरस्वती की वंदना में लिखी गई यह कविता, न केवल निराला के उत्कृष्ट नवगीत, नवगीतकार होने का प्रमाण प्रस्तुत करती है बल्कि इससे यह भी सिद्ध होता है की वे निरंतर नव्यता के अन्वेषण में लगे रहे ! कवी की यह अन्वेषण शक्ति ही उसकी मौलिकता और वैक्तिक पहचान को विस्तार देती है !छान्दसिक अभिव्यक्ति के लिए ही नहीं नवगीत की मूलभूतविशेषताओं और प्रवृतियों और भविष्य के प्रति निराला कितने सचेष्ट थे,बीज रूप में इन साड़ी चीजों को इस गीत में उन्होंने संचित कर दिया है !उनका “स्व” सदैव का प्रतिनिधि रहा है ! कविता से सबका मंगल हो यह कामना करते हुए कविता नव्यता – भव्यता से समृद्ध हो सभ्यता की अनमोल धरोहर बने,निराला की यह संवेदना-सदभावना ही संभावनाओं के नए द्वार नए आकाश खोलने के लिए उन्हें प्रेरित करती रही ! नव गति,नव लय,ताल छंद नव नव नभ के नव विहगवृन्द को नव पर नव स्वर दे ! वीणा वादिनी वर दे ! की प्रार्थना और कामना करने वाला कवी जब अतुकांत और छंद हीन कवितायें लिखता है ! तब यह और भी महत्त्व पूर्ण हो जाता है की कसौतिओं की जांच परख कर ली जाय, फिर सुवर्ण पर हाथ रखा जाय !निराला के मुक्त अथवा रबर या केचुआ छंद एक और साहित्यिक मठाधीशों की आलोचना का शिकार होते रहे और दूसरी और कला और कविता से बाहर की दुनियाँ के लिक्खाडों के कविता लिखने का मार्ग प्रशस्त करते रहे ! और छंद मुक्त कविताओं से किताबें, पात्र पत्रिकाएं ही नहीं कविता के मंच तक भर गए ! किन्तु निराला की छंद मुक्त कविताओं में नवगीत की वे प्रवृतियां जो निराला के समकालीन गीतों और निराला के बाद के नवगीतकारों के के गीतों में विकसित हुईं प्रचुर मात्र में देखि जा सकती हैं !काव्यात्मक अभिव्यक्ति की अनिवार्य शर्त है गति,लय,एवम् ताल, यह निराला की मुक्त छंद कविताओं में भी नए रंग और प्रभाव के साथ मुखरित हुई हैं ! निराला के मुक्त छंद इन शर्तों को नागरिक गेयता के वंचन-वनवास सहकर भी पूरा करते हैं !”जूही की कलि””संध्या सुंदरी”अथवा “जागो फिर एक बार”जैसी कवितायें बिम्ब योजना,चित्रात्मकता, लय और कथ्य की बंकिम नवीनता के अनुपम उदहारण प्रस्तुत करती है ! विजन वल्लरी पर सोती थी सुहाग-भरी-स्नेह-स्वप्न-मग्न अमल-कोमल-तनु तरुणी-जूही की कलि दृग बंद किये शिथिल पत्रांक में !

(जूही की कली)

“मेघमय आसमान से उतर रही है वह संध्या-सुंदरी पारी सी धीरे-धीरे-धीरे !

(संध्या सुंदरी)

“जागो फिर एक बार” उनकी अतुकांत और छंद मुक्त कविता है,किन्तु इसका निम्न अंश देख कर कौन कह सकता है कि,यह कविता छंद हीन होगी सवा सवा लाख पर

एक को चढाऊंगा,

गोविन्द सिंह निज

नाम जब कहाऊंगा,

शेरों की मांड में

आया है फिर स्यार,

जागो फिर एक बार ! यांत्रिकता के इस दौर में व्यवस्था की विसंगतियों के प्रति छोभ और आक्रोश के बीज निराला की कविताओं में नए तेवर के साथ प्रस्फुटित होते हैं आज के प्रायः सभी समर्थ नवगीतकारों के नवगीतों में यह छोभ और आक्रोश पूरी समर्थता के साथ व्यक्त होता है ! निराला कुछ इस तरह उगलते हैं यह आग --- वहीँ गंदे में उगा देता हुआंबुत्ता पहाड़ी से उठा सर ऐंठ कर बोला कुकुरमुत्ता !

निराला अपने युग के सबसे विलक्षण कवी थे ! कविता को लेकर जितने प्रयोग उन्होंने किये उनके मुकाबले हिंदी ही नहीं भारतीय संस्कृत साहित्य में भी कोई कवी नहीं टिकता !अन्वेषण और प्रयोग के समय लिखी गई कविताओं में जितने मूल्य,अर्थ और बोध वे दे जाते हैं वह दुर्लभ है !वे सत्य के साधक थे !उन्हें परम्पराओं को तोड़ने और नए प्रतीक निर्मित करने में बड़ा सुख मिलता था !

कुकुरमुत्ता,खजोहरा,भावों का बटुआ,अनामिका,परमिल,जूही की कलि,चमेली,जैसी कविताओं तथा चतुरी चमार,देवी,कुल्लीभाट एवं बिल्लेसुर बकरिहा जैसी कहानियों ने नए नए प्रतीकों को जन्म ही नहीं दिया बल्कि संघर्ष के बीच जन्मने वाली कविता के सामने नए प्रतीकों और पात्रों के सृजन के नवद्वार भी खोले प्रतीकात्मकता लघु कलेवर नवगीतों के आवश्यक तत्व ही नहीं प्रमाणित हुए,आज नवगीत प्रतीकों के न्वान्वेशण के आधार भी बने हैं !

ध्वनियों के आवर्त, बिम्ब योजना,शब्द लाघव,प्रतीकात्मकता,चित्रात्मकता.एवं,लय संयोजन की आधुनिक प्रवृतियां नवगीत को निराला से ही प्राप्त हुईं !यथार्थ के धरातल पर खुरदरे शब्दों का कलात्मक प्रयोग निराला के पहले नहीं देखा गया !प्रयोगवादी दृष्टि से निराला सबसे अनूठे और अकेले कवी थे !यह अकेलापन उन्होंने सदैव महसूस किया ! नवगीत की तमाम शर्तों को पूरा करने वाला यह गीत उस युग में उनकी एकान्तिक अनुभूति को व्यक्त करता है !

मैं अकेला, देखता हूँ,आ रही

मेरे दिवस की सांध्य बेला !

पके आधे बाल मेरे, हुए निष्प्रभ गाल मेरे, चाल मेरी मंद होती जा रही

हट रहा मेला !

जानता हूँ, नदी झरने, जो मुझे थे पार करने, कर चूका हूँ,हंस रहा यह देख

कोई नहीं मेला !

निराला जीते जी, नव गति नवलय,-छंद नव तथा नव नभ,नव विहंग,तथा नव पर और नव स्वर से युक्त गीतों के मेले देखने को ललकते तरसते अवश्य रहे !पर आज हिंदी का साहित्य नवगीतों और नवगीत –करों के इस भव्य मेले पर गौरव कर सकता है ,जिसे जिसे नवगीतकारों की चार-चार पीढियां सजाने में व्यस्त हैं !

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                                   भोलानाथ

भोलानाथ निराला का आभिर्भाव भारतीय साहित्य-संसार का बसंतोत्सव है !अपने अनुभव और सामर्थ्य से जो भी और जैसा भी जितना भी साहित्य को टटोल और खंगाल पाया हूँ !नवगीत के फूटते हुए उत्स देख और समझ पाया हूँ !निराला जिनमे नवगीत का प्रथम उत्स फूटता हुआ दिखाई देता है संक्षिप्त परिचय नवगीत की गंगोत्री का आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ इस आशा और विस्वास के साथ की सुनी सुनाई भ्रांतियां के बहार निकल कर हम नवगीत की शक्ति और सामर्थ्य को समझ सकें ! विस्मार्क की लौह और रक्त की कूटनीति सेविषाक्त हुए विश्व में उन्नीसवीं शताब्दी जब दम तोड़ रही थी ,निराला का जन्म शताब्दी के अंतिम बसंत में २१फ़रवरी १८९९ के दिन बंगाल के मिदनापुर जिले की महिषादल रियासत में हुआ !निराला गढ़ाकोला का दैन्य और करुना ,महिषादल की सघन हरीत्मा ,बैस्वाडे का ठेठ पौरुष,वैदिक परम्परा पांडित्य लेकर अवतरित हुए ! वे आजीवन शोषण दुरव्यवस्था के अंधमहासगर मथते रहे, विष पीते रहे और अमृत बांटे रहे !निराला के जितने रंग हैं,उनके न रहने पर साहित्यिक बनियों ने उन रंगों से व्यापारिक मेले सजाये और अपने घर भरे,पर निराला के मन में बसे दीन- हीन मनुष्य के भाल का मंगल अभिषेक न हुआ !पुरुषोत्तम दास टंडन और रामचंद्र शुक्ल की उपस्थिति में साहित्य सम्मलेन में पीटने वाला निराला ,जिस भारतीय और भारतीय मनुष्य के गौरव के लिए लड़ता रहा, आज भी वह उतना ही बंधुआ है,उतना ही गिरवी,और उतना ही पराधीन है ! निराला के सामने जितने भी रस्ते थे,वे सब इतने संकीर्ण थे की उनके महाप्राण न तो उन्हें स्वीकार कर सकते थे,न तो उनमें उनका विराट व्यक्तित्व समा सकता था ! तो निराला के कवी को जीवन भर चट्टाने कटनी पड़ीं और पीठ पर नदी ढोनी पड़ी ! बस इसी संघर्ष और श्रजन के बीच अमृत का जो ज्योतिर्मय निर्झर,हजारों सालों से कुचले गए सामान्यजन के चुल्लू तक पहुँच पता है !उसे ही हम नवगीत की संज्ञा देकर निराला और निराला के बाद की छान्दसिक कविता को पंडों और प्रदुषण से मुक्त रखने की च्येष्ठ में जुटे हुए हैं ! निराला के श्रजन में उनके संघर्ष और उनके संघर्ष में इस सृजन को देखे बिना,न तो नवगीत के प्रथम उत्स के रहस्य को समझा जा सकता है और न ही निराला के व्यक्तित्व और कृतित्व की व्याख्या की जा सकती है !पारम्परिक काव्य और कविता की राजनीती से कविता की विशुद्ध धरा को फोड़ कर निकलने में जहाँ चट्टानें कटीं वहीँ नवगीत का जनम हुआ और जहाँ छेनियाँ टूटीं वहां कविता छंधीन होकर रह गई ! बाद में इसी छंधीन कविता को कविता के बनियों ने नई कविता की संज्ञा देकर बेंचना – भांजना शुरू कर दिया ! फिर तो बाकायदा इसका उत्पादन भी प्रारंभ हो गया !सस्ती चीजें जल्दी बनती हैं और जल्दी बिकती हैं !लोकप्रियता अर्जित करने के के सूत्र खोज निकाले गएऔर इस तरह नई कविता और पारंपरिक सस्ते गीतों के नियोग से अक अलग ही प्रकार की कविता का जन्म हुआ !जिसे आजकल मंच की कविता के नाम से ख़रीदा और बेचा जाता है!कौन कला,परिश्रम और समय के संकट में पड़े !लोग तो आनन् फानन रहीस बनाना चाहते हैं! कविता के रहीसों में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है ! निराला के सामने दोहरी कठिनाइयाँ थीं ! अक तो उन्हें निरंतर प्रयोग से गुजरना था दोसरे तमाम तरह के घटिया लोगों के सामने अपनी प्रमाणिकता को बनाये रखना था !यही करण है की प्रयोग के तहत उनहोंने कभी छंद को छोड़ा और कभी छंदों के अभिनव प्रयोग किये !उन्हें निरंतर इन दोनों ही प्रकार की कविताओं की प्रमाणिकता के जिस तत्कालीन मठाधीशों से जूझना पड़ा !महावीर प्रसाद दूवेदी ने गढ़ाकोला से दौलतपुर तक निराला के ढोये आम तो खा लिए उनकी कविताएँ छपने से परहेज ही करते रहे !रामचंद्र शुक्ल से तो उनकी बराबर ठनी रही !रामचंद्र शुक्ल पर निरालाजी की लिखी हुई कविता का यह अंश,उनकी विनोद प्रियता, विरोधिओं को आड़े हांथों लेने को सदा तत्पर रहना तथा कलात्मक अभिव्यक्ति को प्रतिकूल समय में भी बनाये रखने की अदभुतक्षमता का परिचायक है ! - जब से एफ.ए.फेल हुआ, - हमारा कालेज का बचुआ ! - हिंदी का लिक्खाड़ बड़ा वह . - जब देखो तब ऐडा पड़ा वह, - छायावाद रहस्यवाद के - भावों का बटुआ ! आरोप की भाषा में अक बात कही जाती है की, लोग अपनी विधा को निराला से जोड़कर महान बन्ने में जुटे हुए हैं ! यह दंभी मनुष्यों की अधकचरी मानसिकता प्रलाप है ! ऐसे लोग न तो निराला को और न ही परवर्ती नवगीतकारों को समझना चाहते !ये लोग तो साहित्य की दलाली करने में सर्वस्य देखते हैं !आज की वामपंथी एवम् दक्षिण पंथी साहित्यिक संस्थाएं ऐसे ही दलालों की गिरोह बनकर रह गेन हैं !ये संस्थाएं पुरोधा कवियों का यश उड़कर बड़ी बनी हैं ! जबकि आज का नवगीतकार भारतीय कविता को आधुनिक संस्कार देने में साधना रत है ! किसी तरह के वाद से मुक्त,राजनैतिक प्रपंच से दूर रहकर छान्दसिक अभिव्यक्ति को नए क्षितिज देने में वह इतना मुग्ध एवम्मस्त है की प्रतिस्पर्धा की घटिया दौड़ में सम्मलित होने का न तो उसके पास समय है और न ही मानसिकता ! स्वयं निराला वादों के संक्रामक रोगों से कितने मुक्त थे,उनकी मास्को डायलाग्स शीर्षक कविता से यह बात समझी जा सकती है ! फिर कहा, मेरे समाज में बड़े बड़े आदमी हैं, एक से एक मुर्ख,उनको फ़साना है ! XXX XXX XXX XXX XXX उपन्यास लिखा है,जरा देख दीजिये अगर कहीं छप जाय तो प्रभाव पद जाय उल्लू के पट्ठों पर ! XXX XXX XXX XXX देखा उपन्यास मैंने श्री गणेश में मिला पृय अस्नेह्मयी स्यामा मुझे प्रेम है , इसको फिर रख दिया, देखा, मास्को डायेलाग्स देखा गिडवानी को ! निराला का जो अनुभव संसार था उसे चित्रित करने के लिए,उनके पास समय भी तो न था !उसे किसी भी तरह व्यक्त कर देने की गरज से निराला को कभी छंदों से नीचे भी उतरना पड़ा ! यह निराला के लिए निहायत जरुरी था ! किन्तु अपनी रचनात्मक समाधि के क्षणों में उन्होंने जो भी रचा,वे भारतीय कविता के अद्धितीयनमूने हैं !छंद निबद्ध ऐसी ही कविताओं को हम हिंदी के सबसे पहले नवगीत कहते हैं ! बानगी …… नव गति,नव लय,ताल छंद नव नव नभ के नव विहगवृन्द को नव पर नव स्वर दे ! वीणा वादिनी वर दे ! ये पंक्तियाँ नव्यता के प्रति निराला की उत्कट ललक को व्यक्त करती हैं !वीणा वादिनी माँ सरस्वती की वंदना में लिखी गई यह कविता, न केवल निराला के उत्कृष्ट नवगीत, नवगीतकार होने का प्रमाण प्रस्तुत करती है बल्कि इससे यह भी सिद्ध होता है की वे निरंतर नव्यता के अन्वेषण में लगे रहे ! कवी की यह अन्वेषण शक्ति ही उसकी मौलिकता और वैक्तिक पहचान को विस्तार देती है !छान्दसिक अभिव्यक्ति के लिए ही नहीं नवगीत की मूलभूतविशेषताओं और प्रवृतियों और भविष्य के प्रति निराला कितने सचेष्ट थे,बीज रूप में इन साड़ी चीजों को इस गीत में उन्होंने संचित कर दिया है !उनका “स्व” सदैव का प्रतिनिधि रहा है ! कविता से सबका मंगल हो यह कामना करते हुए कविता नव्यता – भव्यता से समृद्ध हो सभ्यता की अनमोल धरोहर बने,निराला की यह संवेदना-सदभावना ही संभावनाओं के नए द्वार नए आकाश खोलने के लिए उन्हें प्रेरित करती रही ! नव गति,नव लय,ताल छंद नव नव नभ के नव विहगवृन्द को नव पर नव स्वर दे ! वीणा वादिनी वर दे ! की प्रार्थना और कामना करने वाला कवी जब अतुकांत और छंद हीन कवितायें लिखता है ! तब यह और भी महत्त्व पूर्ण हो जाता है की कसौतिओं की जांच परख कर ली जाय, फिर सुवर्ण पर हाथ रखा जाय !निराला के मुक्त अथवा रबर या केचुआ छंद एक और साहित्यिक मठाधीशों की आलोचना का शिकार होते रहे और दूसरी और कला और कविता से बाहर की दुनियाँ के लिक्खाडों के कविता लिखने का मार्ग प्रशस्त करते रहे ! और छंद मुक्त कविताओं से किताबें, पात्र पत्रिकाएं ही नहीं कविता के मंच तक भर गए ! किन्तु निराला की छंद मुक्त कविताओं में नवगीत की वे प्रवृतियां जो निराला के समकालीन गीतों और निराला के बाद के नवगीतकारों के के गीतों में विकसित हुईं प्रचुर मात्र में देखि जा सकती हैं !काव्यात्मक अभिव्यक्ति की अनिवार्य शर्त है गति,लय,एवम् ताल, यह निराला की मुक्त छंद कविताओं में भी नए रंग और प्रभाव के साथ मुखरित हुई हैं ! निराला के मुक्त छंद इन शर्तों को नागरिक गेयता के वंचन-वनवास सहकर भी पूरा करते हैं !”जूही की कलि””संध्या सुंदरी”अथवा “जागो फिर एक बार”जैसी कवितायें बिम्ब योजना,चित्रात्मकता, लय और कथ्य की बंकिम नवीनता के अनुपम उदहारण प्रस्तुत करती है ! विजन वल्लरी पर सोती थी सुहाग-भरी-स्नेह-स्वप्न-मग्न अमल-कोमल-तनु तरुणी-जूही की कलि दृग बंद किये शिथिल पत्रांक में !

              (जूही की कली)

“मेघमय आसमान से उतर रही है वह संध्या-सुंदरी पारी सी धीरे-धीरे-धीरे !

      (संध्या सुंदरी)

“जागो फिर एक बार” उनकी अतुकांत और छंद मुक्त कविता है,किन्तु इसका निम्न अंश देख कर कौन कह सकता है कि,यह कविता छंद हीन होगी सवा सवा लाख पर

   एक को चढाऊंगा,

गोविन्द सिंह निज

  नाम जब कहाऊंगा,

शेरों की मांड में

  आया है फिर स्यार,

जागो फिर एक बार ! यांत्रिकता के इस दौर में व्यवस्था की विसंगतियों के प्रति छोभ और आक्रोश के बीज निराला की कविताओं में नए तेवर के साथ प्रस्फुटित होते हैं आज के प्रायः सभी समर्थ नवगीतकारों के नवगीतों में यह छोभ और आक्रोश पूरी समर्थता के साथ व्यक्त होता है ! निराला कुछ इस तरह उगलते हैं यह आग --- वहीँ गंदे में उगा देता हुआंबुत्ता पहाड़ी से उठा सर ऐंठ कर बोला कुकुरमुत्ता !

     निराला अपने युग के सबसे विलक्षण कवी थे ! कविता को लेकर जितने प्रयोग उन्होंने किये उनके मुकाबले हिंदी ही नहीं भारतीय संस्कृत साहित्य में भी कोई कवी नहीं टिकता !अन्वेषण और प्रयोग के समय लिखी गई कविताओं में जितने मूल्य,अर्थ और बोध वे दे जाते हैं वह दुर्लभ है !वे सत्य के साधक थे !उन्हें परम्पराओं को तोड़ने और नए प्रतीक निर्मित करने में बड़ा सुख मिलता था !

कुकुरमुत्ता,खजोहरा,भावों का बटुआ,अनामिका,परमिल,जूही की कलि,चमेली,जैसी कविताओं तथा चतुरी चमार,देवी,कुल्लीभाट एवं बिल्लेसुर बकरिहा जैसी कहानियों ने नए नए प्रतीकों को जन्म ही नहीं दिया बल्कि संघर्ष के बीच जन्मने वाली कविता के सामने नए प्रतीकों और पात्रों के सृजन के नवद्वार भी खोले प्रतीकात्मकता लघु कलेवर नवगीतों के आवश्यक तत्व ही नहीं प्रमाणित हुए,आज नवगीत प्रतीकों के न्वान्वेशण के आधार भी बने हैं !

    ध्वनियों के आवर्त, बिम्ब योजना,शब्द लाघव,प्रतीकात्मकता,चित्रात्मकता.एवं,लय संयोजन की आधुनिक प्रवृतियां नवगीत को निराला से ही प्राप्त हुईं !यथार्थ के धरातल पर खुरदरे शब्दों का कलात्मक प्रयोग निराला के पहले नहीं देखा गया !प्रयोगवादी दृष्टि से निराला सबसे अनूठे और अकेले कवी थे !यह अकेलापन उन्होंने सदैव महसूस किया ! नवगीत की तमाम शर्तों को पूरा करने वाला यह गीत उस युग में उनकी एकान्तिक अनुभूति को व्यक्त करता है !

मैं अकेला, देखता हूँ,आ रही

मेरे दिवस की सांध्य बेला !

पके आधे बाल मेरे, हुए निष्प्रभ गाल मेरे, चाल मेरी मंद होती जा रही

          हट रहा मेला !

जानता हूँ, नदी झरने, जो मुझे थे पार करने, कर चूका हूँ,हंस रहा यह देख

            कोई नहीं मेला !

निराला जीते जी, नव गति नवलय,-छंद नव तथा नव नभ,नव विहंग,तथा नव पर और नव स्वर से युक्त गीतों के मेले देखने को ललकते तरसते अवश्य रहे !पर आज हिंदी का साहित्य नवगीतों और नवगीत –करों के इस भव्य मेले पर गौरव कर सकता है ,जिसे जिसे नवगीतकारों की चार-चार पीढियां सजाने में व्यस्त हैं !

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