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हिन्दी गीतकाव्य के इतिहास में 'गीतांगिनी'(1958,नवगीत का नाम-लक्षण निरूपक प्रथम ऐतिहासिक संकलन) के संपादक एवं प्रकाशक,मुजफ्फरपुर,बिहार के निवासी श्री राजेन्द्र प्रसाद सिंह (1930-2007) माने जाते हैं. वस्तुत: महाकवि निराला समेत कई महत्वपूर्ण रचनाकारों के नए गीत पहली बार 'गीतांगिनी' में ही बतौर 'नवगीत' प्रकाशित हुए थे.  इसके साथ ही गौरतलब है कि हिन्दी नवगीत के रचना-वैविध्य एवं स्वीकृति-संघर्ष में भी राजेन्द्र प्रसाद सिंह की भूमिका अविस्मरणीय रही है । 

हिन्दी कविता के इतिहास में ‘छायावाद का मेनिफेस्टो’ के रूप में जो महत्व ‘पल्लव’ की भूमिका का है, हिन्दी नवगीत संदर्भ में ‘गीतांगिनी’ की भूमिका का भी वही महत्व है, जिसमें बतौर सम्पादक राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने पहली बार यह उद्घोषित किया था—“नयी कविता के कृतित्व से युक्त या वियुक्त भी ऐसे धातव्य कवियों का अभाव नहीं है,जो मानव जीवन के ऊंचे और गहरे, किन्तु,सहज नवीन अनुभव की अनेकता, रमणीयता,मार्मिकता, विच्छित्ति और मांगलिकता को अपने विकसित गीतों में सहेज संवार कर नयी ‘टेकनीक’ से, हार्दिक परिवेश की नयी विशेषताओं का प्रकाशन कर रहे हैं । प्रगति और विकास की दृष्टि से उन रचनाओं का बहुत मूल्य है, जिनमें नयी कविता की प्रगति का पूरक बनकर ‘नवगीत’ का निकाय जन्म ले रहा है । नवगीत नयी अनुभूतियों की प्रक्रिया में संचयित मार्मिक समग्रता का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार होगा, जिसमें अभिव्यक्ति के आधुनिक निकायों का उपयोग और नवीन प्रविधियों का संतुलन होगा ।” इस उद्घोषणा से गुजरने पर किसी भी विवेकशील साहित्यिक को यह सहज अनुभव होगा कि इसमें किसी प्रवर्तक का पैंतरा नहीं, बल्कि उद्घोषक का उल्लास है ।

‘गीतांगिनी’ के सम्पादकीय के रूप में वस्तुतः नवगीत का घोषणा-पत्र प्रस्तुत करते हुए राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने नवगीत के जिन पाँच विकासशील तत्वों को निरूपित किया है,वे हैं— जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा,व्यक्तित्व-बोध, प्रीति-तत्व और परिसंचय । यदि हम हिन्दी गीत-काव्य के इतिहास पर वस्तुनिष्ठ होकर विचार करें तो स्पष्ट होगा कि ‘नवगीत’ के पूर्व गीतों में दर्शन की प्रचुरता थी- जीवन दर्शन की नहीं; धर्म,नैतिकता और रहस्य की निष्ठा का स्रोत था- व्यावहारिक आत्मनिष्ठा का नहीं;व्यक्तिवादिता थी- व्यक्तित्व-बोध नहीं, प्रणय-शृंगार था,जीवनानुभव से अविभाज्य प्रीति-तत्व नहीं तथा सौंदर्य एवं मार्मिकता के प्रदत्त प्रतिमान थे,- प्रेरणा की विविध विषय-वस्तुओं के परिसंचय का सिलसिला नहीं। ‘गीतांगिनी’ में संकलित नवगीतों पर विचारने से हम पाते हैं कि इसके सम्पादकीय में निरूपित पांचों तत्व गीत के स्वभावगत परिवर्तन को रेखांकित कर स्वयंसिद्ध हुए हैं । ये विशेष तत्व, वस्तुतः नयी पीढ़ी के स्वभाव में भी बदलाव ला रहे थे, जो उस पीढ़ी के गीतकारों में उजागर हुए । कालान्तर में ‘गीतांगिनी’ को हिन्दी नवगीत का नाम-लक्षण-निरूपक प्रथम ऐतिहासिक संकलन तथा इसके सम्पादक को नवगीत के नामकर्ता,तत्व-निरूपक एवं तत्पर व्याख्याता और निःस्वार्थ प्रवर्तक के रुप में स्वीकार किया गया ।       

एक स्वतंत्र विधा के रूप में नवगीत की विशिष्टता पर विचार करने के क्रम में हमें सर्वप्रथम नवगीत में रचनाकार, प्रतिपाद्य और आस्वादक की हैसियतों से समीकृत मनुष्य की उस अनुभवशील स्थिति पर विचार करना होगा जिसे रामनरेश पाठक ने तात्विक कहा है । नयी कविता में अनुभवशील व्यक्ति यदि सामाजिक और नवगीत में तात्विक, तो इसकी अभिव्यक्ति नवगीत में कैसे और कहाँ तक हुई है- इसे निष्पक्ष होकर विचारना अपेक्षित है,क्योंकि इस सिलसिले में नवगीत का मार्ग नयी कविता के मार्ग से नितांत भिन्न रहा है। नयी कविता के द्वारा इस दिशा में प्रचारित ‘लघुमानव’ और तथाकथित ‘वैज्ञानिक मानवतावाद’, ‘व्यक्तित्व की खोज’ और ‘पहचान की तलाश’, प्रतिबद्धता और स्वच्छंदता,वैयक्तिक स्वातंत्र्य और मूल्य-मर्यादा, वैचारिक मौलिकता और पारिवेशिक दयित्व आदि विवादास्पद प्रसंगों और नारों का प्रभाव नवगीत की रचनाधर्मिता पर न के बराबर पड़ा है । ये तमाम प्रसंग और नारे साहित्यिक आंदोलनों में नेतृत्व की दलीयता की देन थे मगर इनमें छिपी समस्याओं का सामधान नवगीत में आम आदमी की दृष्टि से मिला है –

मानव जहां बैल घोड़ा है,

कैसा तन-मन का जोड़ा है ।

किस साधन का स्वांग रचा यह,

किस बाधा की बनी त्वचा यह ।

देख रहा है विज्ञ आधुनिक,

वन्य भाव का यह कोड़ा है ।     

इस पर से विश्वास उठ गया,

विद्या से जब मैल छुट गया

पक –पक कर ऐसा फूटा है,

जैसे सावन का फोड़ा है । 

-‘निराला’- (गीतांगिनी, पृ॰ 6)

नयी कविता के सर्वाधिक द्वन्द्वग्रस्त नारों- ‘व्यक्तित्व की खोज’ (Quest of personality) और ‘पहचान की तलाश’ (Search for Identity) का संबंध उस एकांतवादी एवं व्यक्तिनिष्ठ पहलू से रहा है, जिसमें व्यक्ति अपने पूरे अस्तित्व का सामूहिक नियति से विलगाव (Alienation) अनुभव करने लगता है; पर समूह से जुड़ा रहने के लिए स्वयं को विवश महसूस करता है और इस प्रकार वह अपनी नगण्यता से फलीभूत आत्महीनता की चुनौती स्वीकार करता है। इस आंतरिक क्षोभ के फलस्वरूप वह समूह में भी भिन्न और आत्मिक रूप से स्वतंत्र रहने के लिए अपनी पहचान की तलाश करता है । विदेशों में “एंग्री-हिप्पी-बीट जेनेरेशंस” की अनुभव एवं अभिव्यक्ति की पद्धतियों में सक्रिय रह चुके इन दोनों गड्डमड्ड नारों ने भारत में अनेक भाषाओं की साठोत्तर रचनाशीलता में प्रतिवादी नाटकीयता को उत्प्रेरित किया। इन नारों के खोखलेपन को वैचारिक कविता के कवियों ने 1965 के बाद समझा मगर नवगीतकारों ने सन 1960 के आसपास ही पहचान लिया था कि व्यक्ति और समाज के सहज संबंध को नकारना एक तरह से वैज्ञानिक सूझ-बूझ से ही मुँह मोड़ना होगा । राजेन्द्र प्रसाद सिंह के ‘मैं का गीत’ से पता चलता है कि वस्तुतः वैयक्तिकता के रचनात्मक विकास से ऐसे दायभागी व्यक्तित्व का गठन होना चाहिए जिसकी पहचान पूरे दायित्व के निर्वाह में हो:

राजेन्द्र प्रसाद सिंह की पंक्तियाँ ‘मैं का गीत’ में घोषित करती हैं :

“तुम हो तो अपने दृष्टिकोण की सीमा हो,

वे हैं तो एक परिस्थिति में कट रहते हैं,

मैं भी हूँ, यह अभिमान नहीं, अपराध नहीं,

मैं तो प्रतीक सबका है, जो- ‘मैं’ कहते हैं ।” (गीतांगिनी)

यहाँ नवगीतकार अपने व्यक्तित्व के बहुमुखी अंतःसंगीत में दूसरे का साझी है जिससे आम आदमी के समूह में सलयात्मक आंतरिकता पैदा हो सकती है । अतः कहना अनुचित न होगा कि नवगीत के मूल स्वर “व्यक्तित्व-बोध” का अभिप्राय सामूहिक सापेक्षता में आम आदमी का ही बोध है,जिसके अनुभव को सूक्ष्म स्तर पर “व्यक्तित्व के बहुमुखी अंतःसंगीत” का बोध भी मान सकते हैं । राजेन्द्र प्रसाद सिंह की उपर्युक्त मान्यताओं को इसी व्याख्या से रेखांकित करना योग्य है ।

‘गीतांगिनी’ में नवगीत-घोषणा के साथ ऐसे गीतों का सम्पादन कर, ‘निराला’ से रौबिन शा ‘पुष्प’ तक, पाँच पीढ़ियों के नवगीतकारों के प्रायः नब्बे नवगीतों को संकलित कर,प्रस्तुत गीतों को पहली बार ‘नवगीत’ के नाम से अभिहित कर और संपादकीय आलेख में नवगीत के आरंभिक लक्षणों एवं तत्वों का निरूपण कर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने वस्तुतः ऐतिहासिक कार्य सम्पन्न किया । इसे उनके समर्थकों और विरोधियों के द्वारा भी और आधुनिक हिन्दी काव्य एवं गीतकाव्य के भ्रम-मुक्त साहित्येतिहासकारों द्वारा सर्वथा स्वीकार कर लिया गया है; जिसके विरुद्ध कोई भी और किसी की दलील थोथी समझी जाएगी- यह अकाट्य है । यह अकाट्य इसलिए भी है कि ‘गीतांगिनी’ में ही पहली बार नवगीतकार की हैसियत से महाप्राण निराला के साथ ही शंभुनाथ सिंह,डॉ॰ धर्मवीर भारती, डॉ॰ चंद्रदेव सिंह आदि रचनाकार अपनी रचनाओं के साथ सम्मिलित हुए, जिन्हें कालांतर में अपने आगे राजेन्द्र प्रसाद सिंह का ‘नवगीत-प्रवर्तक’पद स्वीकार्य  नहीं हुआ । उनमें अग्रधावी डॉ॰ शंभुनाथ सिंह हैं, जिनके द्वारा स्वीकृत तथाकथित नवगीत के दो ही मूलतत्व हैं- आधुनिकता बोध और लोक तत्व । ज्ञातव्य है कि 'गीतांगिनी' में राजेन्द्र प्रसाद सिंह के दो ही नवगीत हैं और दोनों क्रमशः उन्ही मूल तत्वों को मूर्तित करते हैं- पूरी मौलिकता और गम्भीरता से । आधुनिकता-बोध की रचना ‘जीवन-दर्शन’ खंड के अंतर्गत है : ‘मैं का गीत’। चुनौती का स्वीकार पहली पंक्ति में ही है :

“मैं अरुण-नील अम्बर की सुधा अगर पी लूं,

तो गरल हवा का, लपट धरा की कौन पिये ?”

आगे की पंक्तियों में पाश्चात्य आधुनिकता की संक्रामक लहर का खुलासा करता हुआ कवि कहता है :-

जो नागिन डँसकर मुझे, तुम्हें, उन लोगों को,

बन गई रूप से चित्र और निवसी मन में,

वह और न कोई सिर्फ आधुनिक छलना है,

वह ज्वालाओं की सेज बिछाती जीवन में ।

निम्नलिखित पंक्तियों में फैसला लेने की मुद्रा में कवि दृष्टिगत है-

“मैं भी लूं मुखड़ा ढाँक घुटन की चादर से

तो तार-तार आंचल जनता का कौन सिये ?” (‘गीतांगिनी’, पृ.18)

‘गीतांगिनी’ में ही राजेंद्र प्रसाद सिंह का लोकतत्वमूलक दूसरा नवगीत “नूरानी परस” संकलित है जो “झूमर” के एक लोक-छंद में विन्यस्त है :-

“वह नूरानी परस तुम्हारा तन में मन की याद है;

झूल रहा अंखियन डोरों में दिल सिंदूरी चांद है ।”

उपर्युक्त पंक्तियाँ अपना पता देने में स्वयं सक्षम हैं । साथ ही इनसे यह भी जाहिर होता है कि ‘नवगीत’ उस युग में किस प्रकार काव्य-भाषा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण और दूरगामी अभियान था ।    

राजेन्द्र प्रसाद सिंह के कुछ नवगीत एवं जनगीत :  

आओ खुली बयार (1962)

1. लहरों में आग रुपहली,

ओ S S पुरवाई !

एक मौन की धुन से

हार गई शहनाई ।

जामुनी अंधेरे की,

गजरीली बाहों में,

एक नदी कैद है निगाहों में ।

रूठ नहीं पाती-

इन साँसों पर झुकी हुई परछाई ।

चाँद बिना आसमान

डूब गया धारा में,

लहक भी न उठती

तो हाय ! क्यों न बुझती

अब इन ठंडे शोलों की अंगड़ाई

 2.  ढँक लो और मुझे तुम,

अपनी फूलों सी पलकों से, ढँक लो ।

अनदिख आँसू में दर्पण का,

रंगों की परिभाषा,

मोह अकिंचन मणि-स्वप्नों का

मैं गन्धों की भाषा,

ढँक लो और मुझे तुम

अपने अंकुरवत अधरों से ढँक लो ।

रख लो और मुझे तुम,

अपने सीपी-से अन्तर में रख लो ।

अनबुझ प्यास अथिर पारद की,

मैं ही मृगजल लोभन,

कदली-वन; कपूर का पहरू

मेघों का मधु शोभन ।

रख लो और मुझे तुम

अपने अनफूटे निर्झर में, रख लो ।

सह लो और मुझे तुम,

अपने पावक-से प्राणों पर सह लो ।

मैं हो गया रुई का सागर,

कड़वा धुआँ रसों का,

कुहरे का मक्खन अनजाना,

गीत अचेत नसों का,

सह लो और मुझे तुम,

अपने मंगल वरदानों पर सह लो ।

 3.   आज संस्कारों का अर्पण लो !

गुहा-मनुज मुझ में चुप/प्रस्तर–युग मौन,

धातु-छंद से मुखरित/करतल-ध्वनि कौन ?

मध्ययुगी रक्त-स्नात यौवन का दर्पण लो !

आधुनिक मनुज मेरे/नख शिख में लीन,

विद्युन्मुर्च्छिता/धरा में यंत्रासीन,

‘इहगच्छ, इहतिष्ठ’- अजिर का समर्पण लो ।

लो, अब स्वीकारो यह व्यापक सन्देह,

अपने प्रति शंका का उद्वेलित गेह,

विगत के कुशासन पर आगत का तर्पण लो

आज संस्कारों का अर्पण लो ।”

‘रात आँख मूँद कर जगी’(1980,नवगीत संग्रह ,सहलेखन,दिल्ली)

1 . रात आँख मूँद कर जगी है,

एक अनकही लगन लगी है,

मैं नयन बनूँ,

- पवन बनूँ,

गगन बनूँ,

कि क्या करूँ ?

मुसकेंगे होंठ नहीं,  खिँचेंगी  न भौंहें,

-ऐसी मुश्किल !

चुपकी रह जाएंगी गर्वीली सौहें ,

- कैसी मंजिल !

… जो निहारता रहे,… बने दर्पण,

… परसे ; तो हो जाए परछाई,

… अपनाले, वही  झील बनजाये ;

साँस भाव-गन्ध में पगी है,

गन्ध नील रंग में रँगी है,

मैं नशा बनूँ ;

-तृषा बनूँ ,

- दिशा बनूँ,

की क्या करूँ ?

सिहरन भी रूठेगी,घिरेंगे न सपने,

अब क्या होगा ?

रागिनी शिराओं में लगेगी पनपने

- तब क्या होगा ?

…भरमादे इसे,-वह कुहासा हो,

… दहकादे,-आतिशी तमाशा हो,

… घेर ले,-वही सागर बन जाए;

चाँदनी बिछी ठगी-ठगी है,

आस पंख मारती खगी है,

मैं चँवर बनूँ ,

-भँवर बनूँ,

-लहर बनूँ ,

कि क्या करूँ ?

मुँदी हुई पलकों में बेरूखी अजीब

या बहाना है ?

जागती पुतलियों में चिंता की बात

याकि ताना है ?

…जो अधीन हो,--रहे विटप बनकर

… त्रासदे-अशुभ पंछी बन जाए,

ले जाये बहा,- वह अंधेरा हो !

शायद मनुहार दिल्लगी है,

रात तो अभाव की सगी है,

मैं क्षुधा बनूँ,

- विधा बनूँ,

-सुधा बनूँ,

की क्या करुँ ?

2.  फूल केवड़े का

एक अदद फूल केवड़े का

कहाँ तक बचाकर मैं लाया,-ले आया !

बागीचे में अपने हाथों बचपन के-

काँटों  से ढँका फूल तोड़ लिया नमके ;

दरवाजे सजा दिया, थी निगाह सहमी,

खुशबू से मँह- मँह करती गहमागहमी ;

पर्व सभी पुलके, त्यौहार हुए ताजे,

हवा में उगे पंजे लिए सौ तकाजे !

...आँधी,...भूकंप...अगलगी में

घर छूटा, दर छूटा,छूटा बगीचा ;

बिस्तर ने कभी,कभी मंदिर ने खीचा !

निर्वासित फूल केवड़े का

बचाकर यहाँ  तक मैं लाया,-ले आया !

नाते-रिश्ते के दोमुँहे दोरुखे से-

हाथों-हाथों  गुज़रा फूल झरोखे से;

अंजुरी में बँधा उधर,अंतर तक दमका,

माथे से लगा इधर,शोणित में गमका;

हर तनाव झेल गया युवा-हथेली पर,

पखुरियाँ नोचने  बढ़े सारे वनचर |

...साज़िश,...कानून,...दुश्मनी से

ताश के महल टूटे,धीरज-फल टूटे;

आसरे-भरोसे के सारे पुल टूटे !

यों आहत फूल केवड़े का

यहाँ तक बचाकर मैं लाया,-ले आया !

निजी स्वप्न ढूँढता परायी आँखों में,

गंध-गुण सिरजता तितली की पाँखों में

गदराया जो पराग कोश से समय के-

लाँघ गया लावे की नदी साथ लय के,

मौसम ने जंगल फौलाद के उगाये;

छुआ,तो सलाखों में बौर निकल आये!

-मरूथल से, कई पठारों से-

गुज़रा जो, सूख गिरे दल सभी कटीले ;

बरसे, आखिर बरसे मेघ भी रसीले !

दूरागत फूल केवड़े का

वहाँ से तुम्हीं तक मैं लाया,-ले आया !

3. पूर्णिमा की रात में

पूर्णिमा की रात में यह

मधुर  आमन्त्रण !

शरद के आकाश में-

धूमिल, सजल घन खो गए,

चाँदनी के पलक-तल

थककर नशे में खो गए |

उतर आए दूत

पेड़ों के चँवर झलते ;

खिल उठे सन्देश पाकर

आगमिष्यत् क्षण !

दर्पणीया नदी में

चुपचाप बिम्बित नीलिमा,

चित्रणीय कगार पर

संभाविता की भंगिमा,

हंसी की-सी गूँज

फलियों-भरी फसलों में,

साँस में घुल रहे चन्दन-

के अचीन्हे कण !

मैं न जानूँ किस तरह

ये पाँव उठते जा रहे,

बेखुदी में पास के

परिदृश्य बदले जा रहे !

दीप ढँककर बुझा

ऐपन–कृत हथेली से ;

हो उठे सहसा सिंदूँरी

चाँद के लोचन !

4.   तो अकेला मैं नहीं .....

साथ मेरे चल रही है

इत्र में डूबी हवा ...

तो अकेला मैं नहीं हूँ  !

आज कितने बाद जुड़े-सा बँधा मन

आज अँजुरी फूल-सा

हल्का हुआ तन !

धमनियों में बज उठी है

शरद-पूनो की विभा...

तो अकेला मैं नहीं हूँ !

अब गगन है  रेशमी आँचल रूपहला

तारकों में प्यार का

रोमांच पहला !

चाँद के हँसते नयन में

बनगयी काजल घटा...

तो अकेला मैं नहीं हूँ !

चाँदनी आसंग में खिलती हँसी है

चूड़ियों की खनक-

मर्मर में बसी है !

झील के सौ टूक दर्पण

में किसी का चेहरा...

तो अकेला मैं नहीं हूँ !

सीढ़ियाँ कर पार वर्षों की निमिष में,

मैं खुली छत पर खड़ा

ठंडी तपिश में !

बाहुओं में बँध गई-

अनटूट शीशे की लता...

तो अकेला मैं नहीं हूँ  !

5.  समय की भी तुला पर

पुतलियों में बंद

नीली चिठ्ठियों के होंठ

सहसा खुल गये ;

गोल-घूमी राह पर हम मिल गये !

दस्तकों का सिलसिला

टूटा किसी आवाज़ से

तड़पती कड़ियाँ बजीं

दिल के झनकते साज़ से

हथेली पर उठे

स्वागत के अपरिचित फूल

माथे चढ़ गये ;

जिधर फ़व्वारा,उधर हम बढ़ गये !

रिमझिमी सतरंग छतरी-

लिये,बिजली घेर कर-

नाचती रंगीन शीशों

के बटोर ढेर पर,

चार बाँहों बीच

कितने अन्तराल अथाह

खुद ही भर गये;

सटे दुहरे सूर्य-से हम जुड़ गये !

देखते  ही देखते

सड़कें हुई नदियाँ

तैरते ही तैरते-

लौटीं कई सदियाँ;

बन्द पलकों कसे

सागर-पाखियों के पंख

भीतर खुल गये;

हम समय की भी तुला पर तुल गये !

6. अपना हार पिरोलो

- खोलो जी,

सुबुक नयन खोलो !

वातायन से किरणें झाँकें,

तम-प्रकाश के आखर आँकें,

जगा ज्योति की प्यास रातभर

लौएँ राह विदा की ताकें !

फूल करें मनुहार कि पाँखें

ओस-कणों से धोलो !

-खोलो जी,

तृषित नयन खोलो !

यह उजड़ा-सा  नीड़ तुम्हारा,

बस,टूटा-सा पेड़ सहारा-

सौ तूफानों से लड़कर भी

जो न कभी भीतर से हारा

डालें कहतीं सुधा-पान को

विष से होंठ भिगोलो !

-खोलो जी,

गहन नयन खोलो !

किसकी भौहों में थी बाँकी-

भावी इन्द्रधनुष की झाँकी ?

वह दुख की आँधी में खोयी,

तुम अबतक उड़ते एकाकी !

बदलो,पंछी से माली बन

अपना हार पिरोया !

-खोलो जी,

विशद नयन खोलो !

7. कथा पिछले जनम की

इसी जीवन में मिली

पहचान जो अपनी कभी;

आज सचमुच हो चली

वह कथा पिछले जनम की !

धुन्ध के उस पार भी

तब दीखते थे रंग सब ;

चिलचिलाती धूप  ने

रंगान्ध पूरा कर दिया !

अब सभी कुछ हुआ काला याकि उजला

तीसरा हर पक्ष उसने हर लिया !

इस हथेली में चुभा

था-चाँद:टूटा आइना ;

आज सचमुच हो चली

वह व्यथा पिछले जनम की

दूँ सभी कुछ से न कम,-

जो ले चुके यह मूल्य भी,

थे उन्हीं के तथ्य, जो

अब सत्य मेरा गढ़ चुके |

कुछ नहीं अपना बचा इन मुठ्ठियों में

-यह किताब खुली हुई,-सब पढ़ चुके !

कल्पबेलि कभी झुकी

थी पाँव पर, बन प्रार्थना ;

आज सचमुच हो चली

वह प्रथा पिछले जनम की !

धूप ने धोया जिसे

उस धुन्ध से ही पुत गई ;

अँधेरा सतरंग हो

उजले ठहाकों से धुला |

रंग-पथ पर खास गन्ध उरेहता जो

वही मौसम-तीसरा पख हो चला !

इन्द्रधनु सचमुच पड़ा

था वक्ष पर गलहार बन;

हो चली अनुभूति वह-

अन्यथा पिछले जनम की !

8. प्यार नहीं तन का बन्दी

प्यार नहीं तन का बन्दी

तो मन का भी

कैदी वह कैसे ?

रँग बिना श्रीहीन सुरभि सब,

गीत बिना झंकार अधूरी ;

फिर भी केवल रूप-तृषा से

हो पाती यह प्रीति न पूरी !

नज़रों पर दिल के जादू से

एक नशा-सा चढ़ जाता है ;

मिट-मिट जाती सरस विभा में

वह अपरूप-रूप की दूरी !

स्वप्निल,सहज प्रणय की प्रतिमा,

जग न कभी हो पाता वैसा ;

रूप न नयनों का बन्दी

तो दिल का भी

कैदी वह कैसे ?

छिछला नेह देह-शोभा का,

दरस-परस अनिवार नहीं जी !

प्रेम कभी तन की दूरी का

मन पर  दुर्वह भार नहीं जी !

अंत:पुर में जो लय बजती

वह बनती द्वारों की भाषा

यह अनुराग राग जीवन का

लोलुप का उद्गगार नहीं जी !

रोम-रोम में गति की यति भर

संयम पाता तोष निरंतर ;

तोष न बाहर का बन्दी

तो भीतर का

कैदी वह कैसे ?

खूब रहे ये प्रश्न अनोखे,

-खुद ही बाँध लिया अपने को !

सत्य पुकारे दिशियों में खुल

फिर क्यों दुलराना सपने को,

‘निज’ से ‘पर’ की ओर चले जो,

उसका तन भी मन बन जाता;

सुलग रही बन आगी जो,

उसकाती रहती तपने को !

‘एक’ निरर्थक है,जब तक वह

आप ‘अनेक’नहीं बन जाता;

मर्म नही मति का बंदी

तो गति का ही

कैदी वह कैसे ?

9. बात क्या हुई, कैसे आये ?

पाहुन, चुपचाप खड़े हो नजर झुकाये;

--बात क्या हुई कैसे आये ?

आगे आने में

यह रेतीली कुटिया,

पीछे जाने में

हरियाली की नदिया;

पार के दुआरे पर

काँपती अँगुलियों में

मचलती सिमटने को

एक पूल बगिया....

कागज की डोंगी पर चलो बेकिराये

पहचानी गंध रंग लाये !

यहाँ नहीं मेरी

धड़कनें वहाँ सुनना;

रोज ही सिहन्ता के

शब्दों को गुनना;

बदली ऋतु-शोभा का

आये मेहमान जभी,

दूर, निकल कोई

आभार-गीत बुनना !

सडकों का नंगापन शायद ढँक जाए;

--छनी-छनी धुन स्वरुप पाए !

वहाँ नहीं चलना,

तो रुको नहीं आओ;

छूना है मना, जरा

चेहरा उठाओ.....

लालिमा दुआरे की;

पीयरी दिआरे की,

कलिमा किनारे की

--पीकर मुसकाओ !

हँसी से धुआँ का रंग बदल जाए

-छुई-छुई हवा लौट आये !

10.लाख जतन

लाख जतन

जानकर किये;

पावों के रुख पलटें कैसे ?

--इतने दिन साथ हम जिए !

एक परत टूट गयी

समय की हँसी से,

दूसरी परत हमने

तोड़ दी खुशी से,

--अनहोना हो गया इसी से !

लाख जतन

जानकर किये;

मीठे मुँह तीते हों कैसे ?

--झूमें हम साथ बेपिये !

एक राह छूट गयी

हवा के ज़हर से,

छूट गयी दूजी

पछतावे के डर से,

--अनसोचा हो गया असर से !

लाख जतन

जानकर किये ;

फूल बिंधे अब लौटें कैसे ?

--सासों में गूँथ जो लिये !

रंग-गाँठ कसी रही

शोणित की लय में

गंध-गाँठ खुल आई

पूरक विनिमय में !

-फल गयी सचाई अभिनय में !

लाख जतन

जानकर किये

पत्थर कह झुठलाये कैसे –

रतनों के मोल जो लिए !

एक छाँह सुलग उठी

बर्फ़ की नदी में,

एक छाँह बरस गयी

जलती घाटी में,

--जानें, क्या पैठ गया जी में !

लाख जतन

जानकर किये;

बादल ये फट जाएँ कैसे ?

आँचल के साथ जो सिये !

11. दूधिया दीवार

दूधिया शीशे की दीवार

चारों ओर है !

कैसे जाएगा उस पार

फोकस अन्दर से ?

कैद सन्नाटे का आकार

बाहर शोर है !

यह देह नहीं,--बैलून

यों हो फिसल रहा;

मन नहीं, घिसा नाखून

शीशा खुरच रहा;

गूँजे किसके नाम पुकार

दमघोंटू घर से ?

अजब वातायन जालीदार

ध्वनि का चोर है !

जो लाये थे सोपान,--

गुम्बद से लौटे;

भूले सारे अहसान

दरवाजे छोटे

आये अब कोई झंकार

कैसे बाहर से ?

रतनबटुए का यह संसार

आदमखोर है !

लो, पंखे की भी हवा

गरम होने लगी;

खबरों की भी कल्पना

गूँजे, खोने लगी;

कैसे शीशे का यह द्वार

टूटे मर्मर से ?

रुद्ध हो गई समय की धार,

सिर्फ हिलोर है  !

12. बावजूद चुप

इतनी आवाज़ों के

बाबजूद कैसे

पूरा आसमाँ चुप है l

गीत उमगे जहाँ,

वे रास्ते खोये ;

थी कहाँ मंजिल कि जिसके वास्ते खोये !

रात आधी –बर्राती ,

भोर भी खट-पट लाती ,

दनदना रही दुपहरी,

तमक तड़की घर्राती,

शाम की हँसी खनकती,

रात सुख-दुःख को गाती !

अजब साज-बाजों के

बाबजूद वैसे

पूरा कारवाँ चुप है!

प्रीति उपजी  जहाँ ,

वे क्यारियां खाली ;

बीज उन्नत का ठेका ले रहे माली !

बहसें हर ठौर ज़ारी,

सब पर धमाके भारी ,

जाती ‘सुनहरे कल’ तक

लौटरीवाली गाड़ी

झूठ नारों के सदके !

लूट-मारों के सदके !

गज़ब, ,हर प्रसारण के

बावजूद जैसे-

पूरा आशियाँ चुप है !

गजर आधी रात का

जेल से उठ,

गाँव-घर तक

गूंजता फिर

गजर आधी रात का

पुनः बचपन के बथानों में

खूँदते मिट्टी मवेशी,

खींचते खूँटे,

लगे हुँकारने

चुप खड़े कुत्ते-स्यार

लगे आकनाने.

बूट, कुंदों, लाठियों की मार से चीखी चमरटोली,

देहरी से

सड़क तक फिर,

फिर गरजता

शेर वह फौलाद का.

फिर जवानी की हवाओं से

यों गरम पंखे हो रहे

जैसे कि चिनगी

बाँटती हो साँस;

शहरी कटा आकाश,

-नारों का धुआँ

कोर्ट, थाने, थैलियों के प्रेत को ललकारते झंडे;

शोर-गुल से

चुप्पियों तक

झूलता फिर

लौह पंजा बाज का.

बन्द या उढ़के किवाड़ों पर

दस्तकें हों या पुकारें,

भीतरी दहशत

न घर की टूटती;

-सिर्फ चिन्ता कूटती,

कैसे गुजारें?

गली, नुक्कड़, चौक से अब पक्षियो-सी लौटती आंधी;

पसलियों से

शस्त्र तक फिर

डोलता फण

लाल होते नाग का.

सूख चलें खेत

 सूख चले खेत सेंत-मेंत के,

उठ रहे बवंडर अब रेत के,

चलो, जरा नींद तोड़ देखें,

चुप्पी में भरा शोर देखें.

धनि-धनि खिलती-सी बस्ती

सुलग रही हँसी को तरसती,

वर्षा से हर्षाती हवा की

याद आज बिस्तर को डंसती.

उजड़ गया गमलों का बाग़ भी

बन्द हुआ टिटही का राग भी,

चलो बाँधकर अँजुरी देखें-

शोर में भरी चुप्पी देखें.

गहमागहमी यह शहराती

पाँवों से लिपट-लिपट जाती,

नींद और हँसी जो खरीदों,

-कीमत सुरसा बनती जाती.

रहने को तो गन्दी गली है,

खटने को ही सतमंजिली है,

चलो, बदलकर चश्मा देखें,

टुकड़ों में बंटा समां देखे .

गाँव और कस्बों से बहार

हथियारों के हैं सौदागर

यह अकाल, भूक और सूखा

बदले में लेंगे क्या खाकर ?

कहने को बाहर सनसनी है,

बन्द मगर अपनी चिटखनी है,

झूट के बहाने भर देखें,

छूटकर निशाने पर देखें .

शुभ ललना

(धुन: बधावा)

दादी जगे पराती ले,

माँ हुलसे सँझवाती ले,

मुसके आठों पहर बहुरिया लड़कोरी,

-राम जिलाएँ भैया – भौजी की जोड़ों .

अरे, विरवा जीवे, शुभ ललना,

हाय, जिये जखीरा, शुभ ललना,

बीते कितने बरस, ण गिरती भीत उठी,

गुजरे कितने मास वगैर अंगोछे के ,

पखवारे कट गए बिना गेहूँ खाये;

हफ्ते खछुक हुए महाजन ओछे के ,

दिन गिन-गिन दाने जोड़े,

खेल – तमाशे सब छोड़े,

तब आई यह घडी देह के फलने की,

फिर जनमीं उम्मीदें समय बदलने की,

अजी, बढ़े बबुरवा, शुभ ललना ,

झरबेरिया  लहरे,  शुभ ललना ,

दादा पेरे गए ईख के कोल्हू में;

बापू पिसते रहे तेल की धानी में ,

बोरी ढ़ोते चचा, धनुहिया हुई कमर,

अपनी पसली हँसियाँ हुई जवानी में ,

लहू जलाकर त्यौरी पर,

कौड़ी पाकर ड्योढ़ी पर,

परती तोड़ी, -परत न सहते साइन की,

मौसम बदले, -शत्तीन बदली जीने की,

अहो, बधवा गरजे, शुभ ललना,

मुँह जोरवा बरज, शुभ ललना,

हँसे गुसाई छींट पसीना पुरखों का

छठी – दिठौना बांधे दीढ़ तिजोरी की,

बरही आते सरही बंधक से छूटे;

मुंडन होते बाँह कटे बरजोरी की,

कटे फसल करतारी पर,

झुग्गी चढ़े अंटारी पर,

कर्जी – फर्जी की हरबाजी मात रहे,

जलती लाल मलाल हजारों हाथ रहे,

अरे, तने झगडुआ, शुभ ललना,

अरे, लडे जुझरुआ, शुभ ललना,.

        सुर्खी लहठी-भरे हाथ

            (दीवाली-गीत)

सुर्खी लहठी-भरे हाथ ये

दिये जलाते हैं ,

उनसे सुबह न भेंट,

काम पर निकल गए जो;

शाम हुई, तब लेते आये जिनिस परब के;

खाने भी आये न, दोपहार भुगत चले जो ,

कैसे घर लीपा, फिर चौक पूरायह,

-वे क्या जानें ?

कबके बचे-जुगोये छुट्टे

तेल पुरते हैं,

पोत सफेदी अथक

कोठरी पर काजल की;

घर लौटे लेकर दो बच्चोंकी दो गंजी;

चढ़ा चटक सतरंग, क्रूर कोठी पर छल की,

कैसे मकई खिल-खांड में बदली,

वे क्या जानें ?

आँचल फाड़ बनाये बतिहर

जोत जगाते हैं ,

सेंतमेंत में मांग चार

कदली- थम गाड़े;

लछमी-मूरत नहीं, यहीं औजार टंगेंगे;

उड़ें पटाखे कहीं,-बजेंगे यहाँ नगाड़े,

उछल पेट की आग मशाल चढ़ेंगा,

-कब क्या जानें ?

लोग लुकाठी अभी भाँजते

या सुलगाते हैं,

कूदे उछल कुदाल...

    (धुन : कीर्तन )

भैया, कूदे उछल कुदाल,

हँसियाँ बल खाये ,

भोर हुई, चिड़ियन संग जागे,

खैनी दाब, ढोर संग   लागे,

आँगन लीप, मेहरिया ठनकी,

दे न उधार बनियवां सनकी,

कारज-अरज जिमदार ण माने,

लाठियल अमला विरद बखाने.

भैया, तामे भूख किवाल,

तिरखा  कटखाये ,

“साँझ भई, नहिं आय मुरारी,”

-हाट बाट बहके न अनाड़ी,

तीन दीप : तिरलोक दिवाली,

पंजा-छाप :फाग की लाली,

फुटहा-गुड :पकबान परोसे,

कोदो-भात रींध घर पोसे.

भैया, गुजरे दो-दो साल

कुर्ता   सिलवाये  !

आज रात कम दुखे बिवाई,-

अब न बटेंगे खेत बंटाई,

फरे ‘नगीना,’-पिये पसेना,

बाढ़- सुखाड़ दैव,ना देना,

माथे मौर चढ़े बबुआ के,

बजे रसनचौकी झमका के,

भैया, लहके लाल मशाल,

कुहरा   फट जाए !,

सीने से कान लगाये

(बटगँवनी)

रात भर सोये, रामा,

धरती की गोद में,-

सीने से कान लगाये,

जोर-शोरवाली  दुनिया -  डूब चली   धीमे-धीमे

तस्वीरोंवाली  दुनियाँ – उभर माटी  के जी में-

-कागज के टीले, उनपर

बैठे  लोभी   हरकारे,

दल  दल हाथ हजारों

हर टीले को ललकारें,

सोने का  शेर गरजे

टीलों की ओट में,

-बारूदी बू मंहकाये,

पैठचुकी जब हियरा में’’’’’धक्-धक् धरती के दिल की,

-गूँजती चली बट गंवली घर-घर खोयी मंजिल की,

-समय कासमन्दर खारा

रचे आंसुओं से मोती,

यहाँ पसीने की नदियाँ

किश्तियाँ रतन की ढोतीं,

जल-डाकू  लूट लेते

घेरकर गिरोह में,---

माँझी भी लौट न पाये

सिंहासन से जुड़नाची चाँदी की चाँदनी भी

धरती बदली कारा में कैद हुई स्वामिनी भी

तीसरे पहर का पहरु-

बोलता मरम की बोली-

‘पहिल पहरमें दिवाली,

चौथे पहर में होली,”

संझा की लाली, रामा

धनकेगी भोर में,--

जंगल पराती गाये,

तुझ पर मैं वारी

     (धुन:परिछन)

घोड़ा-न-हाथी, लो आगये बराती—

बदल-से घेरे दुअरिया,

तुझ पर मैं वारी संवरिया रे दुलहा,

तुझ पर मैं वारी संवरिया,

घुटनों के नीचे है धोती गुलाबी,

माथे अंगोछा सजीला;

कुर्ता पुराना है लेकिन केसरिया,

जूता रबड़का रंगीला.

मुँह पर जो धानी रूमलवा रे दुलहा,

नजरें गिराये बिजुरिया,

फूटी न सीसो की गांठें, जो फूटी—

तेरी अनोखी जवानी;

तेरे पसीने से खेती जो लहरी,

--बरसा झमाझम पानी.

बजादिया तूने नगाड़ा रे दुलहा,

खूब ढोल पीटे नगरिया

घुरें जो पीछे से मालिक-महाजन,

--ढह जाय उनकी अटारी;

परिछे सुहागन की टोली झुमूकझूम

गैया हुमकती हमारी .

बछिया है दूबों की पाली रे दुलहा,

धीरे से धरना रसरिया

     छूटी दासता नहीं

(धुन:निरगुन)

ओ संगी,

साथ दे कहाँ तक

दुहरी होरही बहंगीया;

झुकती रीढ़ की धनुहिया;

बदला रास्ता नहीं,

कौन, जो बताये—किसने बोझ ये पराये,

दुखते कांध पर धरे ?

--साथ-साथ ढोये हमने; पुरखों पर रोये,

सबकी किंच में गड़े.

ओ संगी,

पालकी उठाओ---

आये दूर से कहरिया;

बदला वास्ता नहीं,

जोड़ीं उम्मीदों कितनी—तोड़-तोड़ नींदें—

रेती सींचते रहे,

बेचे मवेशी मेले, होकर परदेशी,--

ठेले खींचते रहे,

ओ हटवे,

पलदारी करते—

गुजरी हाँपती उमरिया,

कुचली बाँह की मछरिया;

छूटी दासता नहीं,

माटी से कढ़ती काया, माटी से जुड़ती,--

होगी फिर-फिर माटी,

आग ले बड़े जो, जुल्मी नाग से लडे जो,

-अगली वह परिपाटी,

ओ पंचों ,

बनिहारी करते

लकड़ी-सी जली जिनिगिया,

लड़ती राख से चिनिगिया;

---आँधी का पता नहीं,

भरी सड़क पर

भरी सड़क पर

कुमकुमे जले हैं,

कोई सुई हम

ढूँढ़ने चले हैं,

गुज़र गए हैं जो धूल के बगूले,

सिकुड़ गए जो दीवार के फफोले,

--कौन उनके लिए चूका रहे’’,

बरस-बरस ये

कलेंडर खाले हैं,

कोई घड़ी हम

ढूँढ़ने चले हैं,

गले-गलेयह जंजीर जो बंधी है;

गठरी गूदड़ की पीठ पर लदी है,

--कौन ढोता इन्हें झुका रहे’’’,

हथेलियों पर 

आइने ढले है,

कुतुबनुमा  हम

ढूँढ़ने चले हैं,

न साथ देंगे जो पैर आँखवाले

कटे रहेंगे जो हाथ पाँखवाले,

--कौन उनसे जुड़ा रुका रहे...,

सवारियों  के

मील-दर खुले हैं,

कोई मुहर हम

ढूँढ़ने चले हैं,

ना-साधू-ना चोर

ओ भैया, - ना साधू—ना - चोर

हम मुंह्जोर—झुग्गीवाले,

चटकल की चमनी ने आज तरेरी आँखे,

मिल की भट्टी आग-लहू का भेद मिटाती,

करखनिया मजदूर

इकट्टे हिम्मत से भरपूर

नशे में चूर,--कबीरा गाते’’’

ओ भैया, -- ना साधू—ना-चोर

हम शहजोर---ढाबेवाले,

नाम धरम के पेट पालते भिक माँग जो,

या जो खेलें जुआ, पसीने से, पूंजी का,

दोनों धोखेबाज़,

लड़ाकर हमें भोगते राज,---

खुला यह राज, सामने सबके,

ओ भैया,--ना साधू---ना चोर

हम कमजोर गांठोंवाले,

दलदल में धँस नदी-समन्दर में भी डूबे,

दबे नींव में, दीवारों में चुने गए हम;

छत से फिसले, गिरे,

पहाड़ों-खानों में फँस मरे,

कैद में सड़े—नाम पर श्रम के,

ओ भैया, ना साधू—ना चोर

हम पुरजोर पुट्ठोंवाले,

अजन्ता मिलगई

  नुकीली चट्टानोंकी वही

अबूझ परम्परा;

फिर भी कैसे मुझे अजन्ता मिलगयी,

रंग लिये श्रवनीद्रनाथ के

यों महारथी की रेखाएं जी उठी,---

लिये मीर के टाँके जैस—

ग़ालिब के पैरहन,--ग़ज़ल कोई उठी,

लड़कपन में जो लूसी ग्रे

श्राचीन्ही खो गयी;

वही लौट, साकार सिहन्ता मैल्गायी,

बदला स्वाद समय का, जैसे

चंडीगढ़ के भवनम नये माहौल में,--

रामकिंकर की मूर्ति-कला

मन में जो तोड़ती,--

कैसे वही अटूट श्रवन्ता मिलगयी,

नाटक हुआ स्वभाव कि जैसे

संसद में अभिनय हो पृथ्वीराज का,

फर्जी हुआ विरोध कि जैसे

जुगलबन्द गोदई-किशन महराज का,

उदय शंकर मशीन-नर्त्तन से

जिसे पुकारता;

वही वर्-चेतना नियन्ता मिलगयी,

--तभी मैं ,--तब भी तुम

पेड़ और पर्वत के नाम न थे,

सिन्धु और अम्बरके नाम न थे,

नाम न थे फुल और रंगों के,

--तब भी मैं गन्धवती थी,

--तब भी तुम तेजोमय थे,

भाषा भंगिमा में अंकुरती थी,

निकटता परस से ही जुड़तीथी,

संगति तो संग-संग मुड़ती थी;

--तब भी मैं स्वप्नवती थी,

--तब भी तुम मेधावी थे,

श्रम कर, आश्रम के आश्रमिक हुए,

मूल्यों से भी परिचित तनिक हुए,

तर्के के गुणी सचमुच वणिक हुए,

--तब भी मैं रसवन्ती थी,

--तब भी तुम छलनामय थे,

ले लो जी अपना भाग

लेलो जी, अपना भाग,

कल ये

हाथ पराये होंगे,

आँगन की मिट्टी का मह-मह

चन्दन चुक जाएगा,

पिंजड़े में बैठ सुश्रपंखी

सरगम रुक जाएगा,

गौरया दर्पण-द्वारा न खटकयेगी;

लेलो जी, संचित राग,

कल ये

चषक जुठाये होंगे,

सडकों पर, बागों में धीरज के

पैर छिदे, ठहरे है,

अब भी तो समझो,---घाव

बांसुरी के कितने गहरे है,

यह तो बेगनबेलिया रोज बोलेगी,---

लेल जी , जुड़ती आग,

कल से

बिछुड़े साए होंगे,

लो, नानखटाई लो, शायद यों

फिर ना कभी सिंकपायें,

शर्बत में तिरते नयन चुमलो,

फिर न कभी दिखपायें,

बर्टी की गोली रोज छेद जाएगी’’’,

दे दो मंजरी- सुहाग,

कल से

कनु अनपाये होंगे,.

              अर्थ मेरा क्या?

  तनिक रुक जाओ,

समझ् लूँ—

अर्थ मेरा क्या ?

कुछ कबीरी बंदगी में,

ग़ज़ल-ठुमरी में,

फर्श-नावों पर लहरती

मस्त झिन्झरी में

सुलगते एकांत छान से

देह दुहरी में

---तनिक रम जाओ,

समझ लूँ—

अर्थ मेरा क्या ?

बन्द, नीली खिड़कियोंसे,

अगम गलियों से,

चित्र में भी तड़फाड़ती’’’

दो मछलियोंसे,

झील में डूबी हुई- सी

थिर पुतलियों से

---तनिक जुड़ जाओ,

समझ लूँ—

अर्थ मेरा क्या ?    

भटकते बहुरूपिये को,

थमे मौसम को,

रोज अनखाती किरण से

तुनुक शबनम को,

समय के अनगिन तटों से

बंटे संगम को

---तनिक अपनाओं,

समझ लूँ

अर्थ मेरा क्या ?       

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